श्री कोटेश्वर नाथ मंदिर में रक्षाबंधन पर धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन, प्रेम और सेवा के सूत्र में बंधे संस्था के कार्यकर्ता
पाकुड़। रक्षाबंधन केवल कलाई पर बंधने वाला एक धागा नहीं, बल्कि रिश्तों में विश्वास, आत्मीयता और परस्पर संरक्षण की भावना को मजबूत करने वाला भारतीय संस्कृति का पावन पर्व है। इसी भाव को व्यापक सामाजिक और आध्यात्मिक संकल्प से जोड़ते हुए सत्य सनातन संस्था की ओर से शुक्रवार को पवित्र मुहूर्त में श्री कोटेश्वर नाथ मंदिर में रक्षाबंधन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंदिर परिसर में धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना और सनातन परंपरा का सुंदर संगम देखने को मिला।
रक्षा सूत्र में बंधा प्रेम, भाईचारा और जिम्मेदारी का भाव
कार्यक्रम के दौरान संस्था के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। इस अवसर पर केवल पारंपरिक रस्म का निर्वहन ही नहीं किया गया, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे, सहयोग और एक-दूसरे की रक्षा करने का संकल्प भी लिया गया। रक्षा सूत्र ने मानो यह संदेश दिया कि सच्ची रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन मूल्यों की भी होनी चाहिए जो समाज को जोड़ते हैं और संस्कृति को जीवंत रखते हैं।
छह वर्षों से निभाई जा रही सनातन परंपरा
सत्य सनातन संस्था के संयुक्त सचिव अजय भगत ने कहा कि संस्था की ओर से पिछले छह वर्षों से रक्षाबंधन के अवसर पर इसी प्रकार कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि समय बदल रहा है, जीवनशैली आधुनिक हो रही है और तकनीक ने लोगों के बीच की दूरियां कम कर दी हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल संस्कार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। रक्षाबंधन इन्हीं संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करता है।
रक्षाबंधन रिश्तों के साथ कर्तव्य का भी पर्व
अजय भगत ने कहा कि रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम के पर्व के रूप में देखा जाता है, लेकिन भारतीय परंपरा में इसका भाव इससे कहीं व्यापक है। रक्षा सूत्र परस्पर विश्वास, जिम्मेदारी और संरक्षण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना वास्तव में यह स्मरण कराता है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का दूसरे के प्रति कोई न कोई दायित्व है।
गौ, गंगा, गीता और गायत्री के संरक्षण का संकल्प
कार्यक्रम का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष उस समय और गहरा हो गया, जब संस्था के कार्यकर्ताओं ने गौ, गंगा, गीता और गायत्री के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा एवं सेवा के लिए शपथ ली। कार्यकर्ताओं ने इन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक प्रतीकों के संरक्षण, सम्मान और सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई तथा संकल्प लिया कि वे अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटेंगे।
परंपरा के साथ आधुनिक समाज के प्रति जिम्मेदारी
कार्यक्रम में सनातन संस्कृति की परंपराओं को आधुनिक सामाजिक जीवन से जोड़ने का भाव भी दिखाई दिया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृति का संरक्षण केवल परंपराओं को दोहराने का नाम नहीं, बल्कि उनके मूल संदेश—सेवा, सद्भाव, करुणा, संयम और जिम्मेदारी—को वर्तमान जीवन में उतारने की प्रक्रिया है। आधुनिक समय में धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ना ही परंपरा को जीवंत बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है।
मंदिर परिसर बना आस्था और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र
श्री कोटेश्वर नाथ मंदिर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान धार्मिक वातावरण के साथ आत्मीयता और सामूहिकता का भाव भी देखने को मिला। मंदिर परिसर में रक्षा सूत्र के माध्यम से कार्यकर्ताओं ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया। आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित इस कार्यक्रम ने रक्षाबंधन के पारंपरिक स्वरूप को सामाजिक और सांस्कृतिक संकल्प से जोड़ने का प्रयास किया।
सनातन संस्कृति की रक्षा केवल भावना नहीं, जिम्मेदारी भी
कार्यकर्ताओं ने कहा कि सनातन संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतरता में निहित है। यह संस्कृति केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन को प्रकृति, समाज, परिवार और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने वाली व्यापक जीवन-दृष्टि है। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ अपने आचरण में उसके सकारात्मक मूल्यों को अपनाना और आने वाली पीढ़ियों तक उन्हें पहुंचाना भी है।
रक्षा सूत्र बना संकल्प और सेवा का प्रतीक
रक्षाबंधन के इस आयोजन में रक्षा सूत्र ने पारंपरिक प्रतीक से आगे बढ़कर सेवा और संकल्प का रूप लिया। कलाई पर बंधा धागा कार्यकर्ताओं के लिए एक स्मृति और जिम्मेदारी का प्रतीक बना—ऐसी जिम्मेदारी, जिसमें अपनी संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का भाव जुड़ा रहा।
धर्म, संस्कृति और सामाजिक सद्भाव का संदेश
कार्यक्रम के माध्यम से संस्था ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक चेतना का संदेश देने का प्रयास किया। रक्षाबंधन के अवसर पर लिया गया संकल्प इस विचार को सामने लाता है कि भारतीय पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों को पुनः स्मरण करने के अवसर भी हैं। प्रेम को आधार और सेवा को साधना मानकर आगे बढ़ने का संदेश कार्यक्रम के केंद्र में रहा।
सामूहिक संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित कार्यकर्ताओं ने सनातन संस्कृति, समाज और धार्मिक परंपराओं की रक्षा एवं सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सभी ने संकल्प लिया कि वे अपने स्तर पर संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करेंगे।
इस अवसर पर सत्य सनातन संस्था के संयुक्त सचिव अजय भगत, मिंटू गिरी, अधिवक्ता संजीत मुखर्जी, सुनील साहा, टुनटुन पंडित, देवनाथ घोष सहित अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
रक्षा सूत्र से निकला व्यापक संदेश
रक्षाबंधन के इस आयोजन ने यह भाव उकेरा कि एक छोटा-सा रक्षा सूत्र भी बड़े संकल्प का वाहक बन सकता है। जब उसमें प्रेम का स्पर्श, धर्म का विश्वास, संस्कृति की चेतना और सेवा का भाव जुड़ जाता है, तो वह केवल कलाई की शोभा नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का स्मरण कराने वाला आध्यात्मिक प्रतीक बन जाता है।


