वरिष्ट पत्रकार कृपा सिन्धु बच्चन की कलम से ✍🏻
एक आरटीआई से उठा बड़ा सवाल
पाकुड़ जिले के महेशपुर अंचल से जुड़ा एक मामला इन दिनों कई गंभीर सवालों को जन्म दे रहा है। यह मामला सामने आया है सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत प्राप्त एक आधिकारिक जवाब से, जिसने सरकारी जमीन, हाट-बाजार, बंदोबस्ती और जमाबंदी से जुड़े विरोधाभासों को उजागर कर दिया है।
RTI जवाब में विरोधाभासी तथ्य
महेशपुर अंचल के जनसूचना पदाधिकारी-सह-अंचल अधिकारी द्वारा जारी ज्ञापंक 317/राo/20/11/21 में बताया गया कि मौजा देवीनगर, दाग संख्या 409, रकबा 03 बीघा 01 कट्टा 16 धूर भूमि सर्वे खतियान में अनाबादी खतान एवं बाजार समिति के अंतर्गत दर्ज है। लेकिन इसी दस्तावेज़ में यह भी कहा गया कि यही भूमि हेमंत कुमार सिंह, उज्वल कुमार सिंह और विजय कुमार सिंह (तीनों अश्विनी कुमार सिंह के पुत्र) के नाम से राजस्व पंजी-2 (रजिस्टर 2) में प्रत्येक के नाम 1-1 बीघा जमाबंदी के रूप में दर्ज है।
यहीं से सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है की अनाबादी बाजार समिति के भूमि पर व्यक्तिगत जमाबंदी कैसे हुआ?
हाट, शेड और बंदोबस्ती की सच्चाई
उसी RTI जवाब में यह भी स्पष्ट किया गया कि:
- उक्त भूमि पर हाट (हटिया) लगती है
- वहां शेड का निर्माण हुआ है
- शेड का निर्माण अंचल कार्यालय द्वारा नहीं कराया गया
- हाट की बंदोबस्ती पहले होती थी, जो वर्तमान में स्थगित है
इसका सीधा अर्थ है कि:
- जमीन सार्वजनिक उपयोग में थी
- बाजार समिति के द्वारा डाक एवं विभागीय स्तर पर
- सरकारी व्यवस्था के तहत हाट संचालित होती रही
- वर्षों तक इसे सरकारी हाट के रूप में स्वीकार किया गया
आपत्ति क्यों नहीं की गई?
अब सवाल यह उठता है कि:
- जब हाट लग रही थी
- जब शेड बन रहा था
- जब बंदोबस्ती की नीलामी (डाक) हो रही थी
तब कथित जमीन मालिकों ने कभी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई? और अब जब सूचना है कि इस जमीन को कट्टा स्तर पर बेचा जा रहा है। तो फिर बाजार समिति एवं अनाबादी खतियान में दर्ज जमीन पर अंचल कार्यालय आपत्ति दर्ज क्यों नहीं कर रहा?
राजा की बंदोबस्ती का दावा
रजिस्टर-2 में दर्ज नामधारियों का कहना है कि:
- यह जमीन स्वर्गीय इंद्रजीत सिंह के नाम
- जमींदारी उन्मूलन कानून से पहले
- तत्कालीन राजा (जमींदार) द्वारा बंदोबस्त की गई थी
लेकिन उनके पुत्र ज्योतिष चन्द्र सिंह का नाम सरकारी कागजातों में कहीं दर्ज नहीं है। उनकी मृत्यु लगभग 70 वर्ष पूर्व हो चुकी है।
हाट चलता रहा, विरोध कभी नहीं हुआ
स्थानीय जानकारों के अनुसार:
- हटिया ज्योतिष चन्द्र सिंह के समय से ही लगती रही
- उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी विरोध नहीं किया
- इसलिए वर्षों तक हाट निर्बाध रूप से चलती रही
यह बात भी इस ओर संकेत करती है कि जमीन को सार्वजनिक उपयोग की तरह ही देखा जाता रहा।
पाँच पुत्र, लेकिन जमाबंदी सिर्फ एक के वंशजों के नाम
ज्योतिष चन्द्र सिंह के पाँच पुत्र थे:
- अश्विनी कुमार सिंह
- मनोरंजन सिंह
- सत्यनारायण सिंह
- सत्यवान सिंह
- नोनिगोपाल सिंह
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से रजिस्टर-2 में केवल अश्विनी कुमार सिंह के तीन पुत्रों के नाम ही दर्ज हैं। जबकि अश्वनी कुमार सिंह के बड़े पुत्र जितेन्द्र सिंह का नाम नहीं हैं। बाकी चार भाइयों और उनके वंशजों का नाम कहीं नहीं।
अश्वनी कुमार सिंह जब तक जीवित थे, जमीन रही सरकारी
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक अश्विनी कुमार सिंह जीवित थे। तब तक यह जमीन सरकारी हाट ही मानी जाती थी। बाजार समिति के द्वारा डाक क्षेत्र थे एवं कई साल विभागीय तहशील हुआ।
तो फिर अचानक जमीन का स्वरूप कैसे बदल गया? सरकारी हाट निजी जमीन कैसे बन गई? यही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है।
2018–2021 के बीच हुआ खेल?
सूत्रों के अनुसार 2018 से 2021 के बीच यह पूरा गड़बड़-झाला अंजाम दिया गया। इसमें अंचल कार्यालय के कर्मियों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। इस अवधि में और भी कई फर्जीवाड़ा हुआ हैं। यह भी कहा जा रहा है कि एक गांव में तत्कालीन राजा के हस्ताक्षर की हु-ब-हु नकल करने वाले व्यक्ति की मदद से नकली बंदोबस्ती पर्ची तैयार की गई।
नकली हस्ताक्षर और अरबों की जमीन
जानकारों का दावा है कि पाकुड़ जिले के महेशपुर प्रखंड में नकली जमींदारी हस्ताक्षरों के सहारे करोड़ों नहीं, अरबों की जमीन हड़प ली गई। यह मामला उसी बड़ी साजिश की एक कड़ी हो सकता है।
जांच क्यों जरूरी है
भले ही कोई इसे मनगढ़ंत आरोप कहे, लेकिन:
- सरकारी हाट की जमीन का अचानक निजी बन जाना
- रिकॉर्ड में विरोधाभास
- वंशजों के अधिकारों की अनदेखी
ये सभी तथ्य इस मामले को गंभीर जांच योग्य बनाते हैं।
क्योंकि:
- जब इंच भर जमीन भी झगड़ों और षड्यंत्रों का कारण बनती है
- तब चार भाइयों और उनके वंशजों की चुप्पी अपने आप में सवाल खड़े करती है
सवाल कायम है
पाकुड़ के देवीनगर की यह जमीन सिर्फ जमीन नहीं, यह प्रशासनिक पारदर्शिता, भूमि सुधार व्यवस्था और न्याय की परीक्षा है।
अब सवाल यही है-
क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दब कर रह जाएगा?
फैसला अब प्रशासन और जांच एजेंसियों को करना है।


