पाकुड़। वक्त गुजरता है तो चेहरे पर झुर्रियां छोड़ जाता है, लेकिन अपने साथ अनुभवों का ऐसा खजाना भी छोड़ जाता है, जिसकी कोई कीमत नहीं होती। बुजुर्ग उसी खजाने के रखवाले हैं। उनके चेहरे की हर लकीर जिंदगी के किसी अध्याय की कहानी कहती है और उनकी खामोशी में भी कई पीढ़ियों का अनुभव छिपा होता है। ऐसे ही जीवन के अनुभवी पन्नों को सम्मान और अपनत्व का एहसास कराने के लिए पाकुड़ में ‘अकेले नहीं आप’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
झालसा रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) पाकुड़ के तत्वावधान में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ दिवाकर पांडेय के निर्देश पर पाकुड़ व्यवहार न्यायालय स्थित डालसा सभागार में वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में बुजुर्गों का गुलाब देकर स्वागत किया गया तो माहौल में औपचारिकता से अधिक अपनत्व दिखाई दिया।
उम्र बढ़ती है, रिश्तों की जरूरत नहीं घटती
कार्यक्रम में डालसा सचिव रूपा बंदना किरो ने कहा कि बुजुर्ग केवल परिवार के वरिष्ठ सदस्य नहीं, बल्कि अनुभव, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों की जीवित धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग अपने जीवन के अनुभवों और पारिवारिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाकर समाज की स्मृतियों और संस्कारों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने नई पीढ़ी से बुजुर्गों के अनुभवों से सीख लेने, उनका सम्मान करने और उन्हें अकेलेपन से बचाने की अपील की। उनके संदेश में एक ऐसी सामाजिक जिम्मेदारी की झलक थी, जिसे अक्सर आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हम पीछे छोड़ आते हैं।
बूढ़े पेड़ों की छांव में ही अक्सर आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते बनते हैं।
बुजुर्गों के जीवन की हर झुर्री अपने भीतर संघर्ष, अनुभव और समय की एक कहानी समेटे है। वे उस पुराने वृक्ष की तरह हैं, जिसकी छांव में कई पीढ़ियां पली-बढ़ी हैं। उनकी बातें भले आज के तेज दौर में धीमी लगें, लेकिन उनमें जिंदगी को समझने की वह गहराई होती है, जिसे किताबों के पन्नों में ढूंढना आसान नहीं।
कानून ने बताया अधिकार, रिश्तों ने समझाया अपनापन
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बुजुर्गों के महत्व और उनके अधिकारों पर भी चर्चा हुई। लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के चीफ सुबोध कुमार दफादार ने वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े कानूनी अधिकारों और सरकारी योजनाओं के संबंध में जानकारी दी।
वहीं एलएडीसीएस के डिप्टी चीफ मो. नुकुमुद्दीन शेख ने वरिष्ठ नागरिक दिवस मनाने के उद्देश्य और बुजुर्गों के प्रति समाज की जिम्मेदारी को लेकर जागरूक किया।
कार्यक्रम में इंडियन नेशनल एसोसिएशन के अध्यक्ष जेड.एच. विश्वास ने बुजुर्गों के अधिकारों के साथ उनके साथ समय बिताने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज हम जिस अवस्था में हैं, बुजुर्ग उस अवस्था से पहले ही गुजर चुके हैं। उनके साथ बैठना, उनकी बातें सुनना और उनके अनुभवों को समझना आने वाली जिंदगी के लिए सीख हासिल करने जैसा है।
गुलाब का फूल छोटा था, मगर संदेश बहुत बड़ा
कार्यक्रम के दौरान जब वरिष्ठ नागरिकों को गुलाब देकर सम्मानित किया गया तो उस छोटे से फूल में सम्मान से कहीं बड़ा भाव दिखाई दिया।
गुलाब कुछ देर में मुरझा सकता है, लेकिन सम्मान का स्पर्श लंबे समय तक दिल में जीवित रहता है।
कभी जिन हाथों ने बच्चों की उंगलियां पकड़कर उन्हें चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को उम्र के अंतिम पड़ाव में सहारे की जरूरत होती है। जिन आंखों ने अपने बच्चों के भविष्य के सपने देखे, उन्हीं आंखों को आज अपनेपन की एक नजर चाहिए। शायद इसी भाव को ‘अकेले नहीं आप’ कार्यक्रम ने शब्दों से ज्यादा संवेदना के माध्यम से सामने रखा।
बुजुर्गों के बीच से उठी उम्मीद की आवाज
कार्यक्रम में एऐन पाकुड़ के अध्यक्ष अजीजुल रियाज, सोनाजोड़ी की मुखिया सुकन्या मरांडी, वरिष्ठ नागरिक मौलाना असगर अली एवं सिराजुल अंसारी तथा अखिल भारतीय गरीब दलित सेवा संघ की अध्यक्ष आलियारा खातून ने भी अपने विचार रखे और वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, अधिकार तथा सामाजिक सहभागिता को लेकर सकारात्मक संदेश दिया।
इन विचारों में एक साझा भावना थी—बुजुर्गों को दया नहीं, सम्मान चाहिए; दूरी नहीं, अपनापन चाहिए; और सबसे बढ़कर यह एहसास चाहिए कि वे आज भी परिवार और समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
नई पीढ़ी के नाम एक खामोश संदेश
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में समय की कमी का सबसे बड़ा बहाना शायद यही है कि हमारे पास किसी के लिए वक्त नहीं। लेकिन बुजुर्गों के लिए कुछ पल निकालना केवल उनका सम्मान करना नहीं, बल्कि अपने अतीत से मुलाकात करना भी है।
क्योंकि जिस पीढ़ी को हम बूढ़ा समझकर पीछे छोड़ देते हैं, उसी पीढ़ी ने अपने संघर्षों से हमारे लिए रास्ते बनाए हैं।
उनकी कहानियों में वह समय है जिसे किताबें पूरी तरह दर्ज नहीं कर सकतीं। उनके अनुभवों में वह ज्ञान है जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं मिलता। और उनके आशीर्वाद में वह सुकून है, जिसे आधुनिक जीवन की तमाम सुविधाएं भी नहीं खरीद सकतीं।
इसीलिए बुजुर्गों का सम्मान किसी एक दिवस की रस्म नहीं, बल्कि रिश्तों को जीवित रखने की संस्कृति है। वक्त की किताब के ये खूबसूरत पन्ने अगर हमारे पास हैं, तो उन्हें पढ़ने, सुनने और संभालने का इससे बेहतर समय शायद कोई नहीं।
मौके पर डालसा कर्मी, उप मुखिया विनोद कुमार, पंचायत सचिव राधेश्याम मंडल, पैरा लीगल वॉलिंटियर्स पिंकी मंडल, विजय राजवंशी, उत्पल मंडल और नीरज कुमार राउत समेत अन्य लोग उपस्थित रहे।


