पाकुड़। मन दिखाई नहीं देता, लेकिन मन की पीड़ा अक्सर चेहरे की खामोशी, आंखों की उदासी और व्यवहार की अनकही बेचैनी में दिखाई देती है। मानसिक बीमारी केवल किसी व्यक्ति के भीतर चल रहा चिकित्सकीय संघर्ष नहीं, बल्कि परिवार, समाज और कभी-कभी उसके अधिकारों के लिए भी एक लंबी लड़ाई बन जाती है। ऐसे समय में इलाज के साथ यदि संवेदना और कानून का हाथ मिल जाए, तो बीमारी से लड़ते व्यक्ति के लिए उम्मीद की एक नई खिड़की खुल सकती है।
इसी मानवीय सोच और कानूनी चेतना को केंद्र में रखते हुए झालसा, रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के तत्वावधान में पाकुड़ प्रखंड के सोनाजोड़ी में मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्तियों एवं बौद्धिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए कानूनी सेवाओं से संबंधित जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ दिवाकर पांडेय के निर्देश पर तथा प्रभारी डालसा सचिव विशाल मांझी के मार्गदर्शन में किया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन सिविल सर्जन डॉ. नवीन कुमार संथालिया, डीएस सोहेल अनवर आजमी, लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के चीफ सुबोध कुमार दफादार, एलएडीसीएस के डिप्टी चीफ संजीव कुमार मंडल, डॉ. दयानंद आर्य, डॉ. अमित कुमार, डॉ. प्रकाश कुमार एवं डीसीपी चंद्र शेखर चौधरी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
इलाज से आगे, इंसान को समझने की जरूरत
सिविल सर्जन डॉ. नवीन कुमार संथालिया ने मानसिक स्वास्थ्य को जीवन का मूलभूत हिस्सा बताते हुए कहा कि तनाव, चिंता, अवसाद और अन्य मानसिक समस्याएं व्यक्ति के जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में प्रयास केवल बीमारी का उपचार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि बीमारी की जड़ तक पहुंचना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पीड़ित व्यक्ति से संवाद स्थापित करना, उसकी समस्या के मूल कारणों को समझना, उसकी सही पहचान और चिकित्सा सुनिश्चित करना तथा परिवार और समाज का सहयोग उपलब्ध कराना उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके साथ कौशल विकास, शिक्षा, कानूनी सहायता और सरकारी योजनाओं से जोड़ना भी आवश्यक है।
उनकी बातों में चिकित्सा से आगे बढ़कर एक सामाजिक दर्शन दिखाई दिया- किसी व्यक्ति की बीमारी को उसकी पूरी पहचान नहीं बनने देना। बीमारी व्यक्ति का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसका पूरा व्यक्तित्व नहीं।
उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों से चिकित्सकों से संपर्क कर उचित परामर्श एवं सहयोग लेने की अपील की।
कानून की नजर में मानसिक रोगी नहीं, अधिकारों वाला नागरिक
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मानसिक रोग और बौद्धिक अक्षमता वाले व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों को लेकर जागरूकता रहा।
लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के चीफ सुबोध कुमार दफादार एवं डिप्टी चीफ संजीव कुमार मंडल ने संयुक्त रूप से बताया कि भारत में मानसिक रोग एवं बौद्धिक अक्षमता वाले व्यक्तियों के लिए मुफ्त और सक्षम कानूनी सेवाओं का विशेष प्रावधान है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मानसिक बीमारी या बौद्धिक अक्षमता से प्रभावित व्यक्ति अपनी विशिष्ट कानूनी एवं सामाजिक जरूरतों के अनुरूप न्याय और सहायता प्राप्त कर सके।
उन्होंने बताया कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12(d) के तहत दिव्यांग व्यक्ति निःशुल्क कानूनी सहायता पाने का हकदार है। वहीं मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के तहत मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे व्यक्ति को अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने के लिए निःशुल्क कानूनी सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार है।
यह संदेश महज कानूनी प्रावधान की जानकारी नहीं था। इसके पीछे लोकतंत्र का वह मूल विचार भी था कि न्याय की चौखट तक पहुंच व्यक्ति की मानसिक स्थिति, आर्थिक क्षमता या सामाजिक परिस्थिति से तय नहीं होनी चाहिए।
न्यूरोसिस और साइकोसिस के बीच अंतर समझाया
डॉ. प्रकाश कुमार ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने न्यूरोसिस और साइकोसिस के बीच अंतर समझाते हुए बताया कि न्यूरोसिस में व्यक्ति को अक्सर अपनी मानसिक परेशानी का एहसास रहता है और उसका वास्तविकता से संपर्क बना रहता है। इसमें चिंता, घबराहट, डर और उदासी जैसे लक्षण प्रमुख हो सकते हैं।
वहीं साइकोसिस की स्थिति में व्यक्ति का वास्तविकता से संपर्क प्रभावित हो सकता है। भ्रम या ऐसी चीजों का अनुभव होना जो वास्तव में मौजूद नहीं हैं, जैसे आवाजें सुनाई देना अथवा ऐसी चीजें दिखाई देना जो वहां नहीं हैं, इसके लक्षणों में शामिल हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के बोलने, सोचने और व्यवहार में भी असामान्य परिवर्तन दिखाई दे सकता है।
इन जानकारियों का उद्देश्य मानसिक बीमारी को लेकर समाज में मौजूद भ्रम और पूर्वाग्रह को कम करना तथा समय पर पहचान और उपचार के प्रति जागरूकता पैदा करना रहा।
बच्चों पर तुलना और सफलता का अनावश्यक दबाव न डालें
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से न करें। पढ़ाई, नौकरी या जीवन में सफलता के नाम पर लगातार दबाव डालना बच्चे के मन पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि मानसिक रूप से कमजोर या परेशान बच्चों को डांटने अथवा अलग-थलग करने के बजाय उनसे संवाद स्थापित किया जाना चाहिए। उनके व्यवहार के पीछे छिपे कारणों को समझने का प्रयास होना चाहिए, ताकि परिवार में ऐसा वातावरण बने जहां बच्चा अपनी परेशानी कहने से डरे नहीं।
क्योंकि कई बार बच्चे को समाधान से पहले एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उसकी बात बिना निर्णय सुन सके।
संवेदना और कानून का मिलन
कार्यक्रम में सीएस सोहेल अनवर आजमी, डॉ. अमित कुमार, एएमपी डॉ. अजीजुल रहमान, जिला कोऑर्डिनेटर पीएचडी मो. इमरान आलम, इंडियन नेशनल एसोसिएशन के अध्यक्ष जेड.एच. विश्वास एवं सहायक कार्यक्रम समीर खान समेत अन्य वक्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्रम के उद्देश्यों पर अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने मानसिक बीमारी से बचाव, उपचार, पारिवारिक सहयोग और कानूनी सहायता के विभिन्न पहलुओं पर जागरूक किया।
मौके पर अस्पताल के कर्मी, सहिया, एनजीओ के प्रतिनिधि तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के पैरा लीगल वॉलिंटियर्स खुदु राजवंशी और नीरज कुमार राउत सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
असली सवाल बीमारी का नहीं, हमारी दृष्टि का है
सोनाजोड़ी में आयोजित यह शिविर एक सामान्य जागरूकता कार्यक्रम से आगे बढ़कर समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ गया, क्या हम मानसिक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को उसकी बीमारी से पहचानते हैं या उसकी इंसानियत से?
आधुनिक चिकित्सा बीमारी का उपचार कर सकती है, कानून अधिकारों की रक्षा कर सकता है और सरकार सहायता उपलब्ध करा सकती है। लेकिन इन तीनों के बीच जो सबसे जरूरी कड़ी है, वह है मानवीय संवेदना।
किसी व्यक्ति का मानसिक रूप से अस्वस्थ होना उसके सम्मान को कम नहीं करता। उसकी आवाज कमजोर हो सकती है, लेकिन उसके अधिकार कमजोर नहीं होते। उसका व्यवहार बदल सकता है, लेकिन उसकी गरिमा नहीं बदलती।
शायद इसी विचार में इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा दर्शन छिपा है, मनुष्य पहले है, बीमारी बाद में; अधिकार पहले हैं, परिस्थितियां बाद में। और जब कानून किसी मौन पीड़ा के साथ खड़ा होता है, तो न्याय केवल अदालत की चारदीवारी में नहीं रहता, बल्कि समाज के उस हिस्से तक पहुंचता है जहां किसी व्यक्ति को सबसे ज्यादा उसकी जरूरत होती है।


