पाकुड़। न्याय केवल अदालत की चारदीवारी में सुनाया गया फैसला नहीं, बल्कि वह समाधान भी है जो विवाद को समाप्त कर दोनों पक्षों को राहत की राह दिखाए। इसी भावना को साकार करते हुए पाकुड़ में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत ने हजारों लंबित मामलों के बीच सुलह, समझौते और त्वरित न्याय की नई तस्वीर पेश की।
राष्ट्रीय लोक अदालत का वर्चुअल उद्घाटन झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सह कार्यकारी अध्यक्ष, झालसा रांची, न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने किया। इस अवसर पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के तत्वावधान में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ दिवाकर पांडेय की अध्यक्षता में पाकुड़ व्यवहार न्यायालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिले के सभी न्यायिक पदाधिकारी वर्चुअल माध्यम से इस आयोजन से जुड़े।
आठ बेंचों ने संभाली न्याय की कमान
राष्ट्रीय लोक अदालत के सफल संचालन के लिए कुल आठ बेंचों का गठन किया गया। इन बेंचों के समक्ष सुलहनीय एवं समझौता योग्य विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए पक्षकारों को आपसी सहमति के आधार पर विवादों के समाधान का अवसर दिया गया।
लोक अदालत की सबसे बड़ी उपलब्धि इसके आंकड़ों में दर्ज हुई। कुल 18,864 वादों का निष्पादन किया गया, जबकि विभिन्न मामलों में 5 करोड़ 85 लाख 56 हजार 476 रुपये का समझौता कराया गया।
इन आंकड़ों ने यह संदेश भी दिया कि न्याय की गति केवल निर्णय सुनाने में नहीं, बल्कि विवाद को सहमति और संवाद के जरिए समाप्त करने में भी निहित है।
मुकदमों के बोझ के बीच समझौते की राह
राष्ट्रीय लोक अदालत का मूल उद्देश्य आम लोगों को सुलभ, त्वरित और कम खर्च में न्याय उपलब्ध कराना है। साथ ही न्यायालयों में लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करना भी इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
लोक अदालत की प्रक्रिया में पक्षकारों के बीच आपसी सहमति और सुलह-समझौते को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे मामलों में जहां कानून इसकी अनुमति देता है, विवाद को लंबी न्यायिक प्रक्रिया में ले जाने के बजाय दोनों पक्षों की सहमति से समाधान का रास्ता निकाला जाता है।
यही वजह है कि लोक अदालत को आम आदमी के लिए न्याय व्यवस्था का ऐसा मंच माना जाता है, जहां कानून की मर्यादा और मानवीय संवेदना साथ-साथ चलती हैं।
न्यायालय परिसर में दिखी व्यापक भागीदारी
कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश, कुटुंब न्यायालय रजनीकांत पाठक, अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम कुमार क्रांति प्रसाद, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी संजीत कुमार चंद्र, डालसा सचिव रूपा बंदना किरो, अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विशाल मांझी, अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी सदिश उज्जवल बेक और प्रभारी न्यायाधीश विजय कुमार दास समेत अन्य न्यायिक पदाधिकारी मौजूद रहे।
इसके अलावा पैनल अधिवक्ता, लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के अधिवक्ता, मेडिएटर अधिवक्ता, स्थायी लोक अदालत के सदस्य, विभिन्न बैंकों के अधिकारी, न्यायालय कर्मी, संबंधित विभागों के अधिकारी, पैरा लीगल वॉलिंटियर्स तथा बड़ी संख्या में वादी-प्रतिवादी भी उपस्थित रहे।
‘फैसले’ से आगे बढ़कर ‘समाधान’ की ओर
राष्ट्रीय लोक अदालत ने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि न्याय व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल किसी विवाद में जीत-हार तय करना नहीं, बल्कि विवाद का ऐसा समाधान तलाशना है, जिससे पक्षकारों को राहत मिले और सामाजिक संबंधों में भी अनावश्यक कटुता न बढ़े।
पाकुड़ में 18,864 मामलों का निष्पादन और करोड़ों रुपये के समझौते इस बात के प्रमाण हैं कि जब कानून की शक्ति के साथ संवाद की संभावना जुड़ती है, तो विवादों की लंबी राह छोटी हो सकती है।
राष्ट्रीय लोक अदालत का यह आयोजन उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आया, जो लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया के बीच अपने विवाद के अंतिम पड़ाव की प्रतीक्षा कर रहे थे। अदालत परिसर में इस दिन कई विवादों को विराम मिला और अनेक पक्षकारों ने राहत की सांस ली।
कुल मिलाकर, पाकुड़ की राष्ट्रीय लोक अदालत ने यह संदेश स्पष्ट किया कि न्याय की राह कठिन और लंबी होने की अनिवार्यता नहीं है—सही मंच, उचित प्रक्रिया और आपसी सहमति के साथ विवाद का अंत भी संभव है।


