रानी दिग्घी में इतिहास के एक विचारक को नमन
पाकुड़। इतिहास केवल बीते हुए समय की कहानी नहीं होता, बल्कि वह उन विचारों की विरासत भी होता है, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देते हैं। ऐसे ही विचारों की विरासत से जुड़े पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर पाकुड़ में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। भारतीय जनता पार्टी पाकुड़ नगर मंडल के कार्यकर्ताओं ने तांतीपाड़ा स्थित दीनदयाल उद्यान (रानी दिग्घी) में स्थापित उनकी आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए।
प्रतिमा के सामने श्रद्धांजलि, विचारों के साथ आगे बढ़ने का संकल्प
कार्यक्रम केवल पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं रहा। भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनकी जयंती को अंत्योदय दिवस के रूप में मनाते हुए उनके विचारों और आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने तथा समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा का भाव लेकर पहुंचने का संकल्प दोहराया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भाजपा नगर अध्यक्ष सोहन मंडल ने की।
एकात्म मानववाद—व्यक्ति नहीं, संपूर्ण समाज को देखने का दर्शन
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से जुड़े समग्र व्यक्तित्व के रूप में देखने की अवधारणा प्रमुख रही। उनके एकात्म मानववाद के दर्शन में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संबंध को भारतीय जीवन-दृष्टि के संदर्भ में समझने का प्रयास दिखाई देता है। यही कारण है कि उनकी जयंती पर उनके समर्थक उनके विचारों को वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों से जोड़कर देखते हैं।
अंत्योदय—विकास की अंतिम सीढ़ी तक पहुंचने की सोच
दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में अंत्योदय का विचार विशेष महत्व रखता है—अर्थात समाज के उस व्यक्ति तक विकास और कल्याण की पहुंच, जो सबसे पीछे खड़ा है। भाजपा जिला उपाध्यक्ष-सह-मंडल प्रभारी हिसाबी राय ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को केंद्र में रखकर राष्ट्र निर्माण की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका चिंतन समाज के प्रत्येक व्यक्ति के समग्र विकास और अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन से जुड़ा था।
राजनीति के केंद्र में समाज का अंतिम व्यक्ति

हिसाबी राय ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सामाजिक समरसता, विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण पर केंद्रित था। उनके अनुसार, दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार यह है कि राष्ट्र निर्माण को केवल सत्ता या व्यवस्था परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि समाज के व्यापक उत्थान की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।
विचारों की विरासत को वर्तमान से जोड़ने की कोशिश

भाजपा जिला महामंत्री रूपेश भगत ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन भारतीय संस्कृति की जीवन-दृष्टि, सामाजिक समरसता और अंतिम व्यक्ति के कल्याण को केंद्र में रखता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सामाजिक संदर्भ में उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए वंचित, गरीब और जरूरतमंद वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इतिहास की स्मृति से सेवा की राजनीति तक
जयंती समारोह में दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, संघर्ष और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को याद किया गया। उनके समर्थकों ने कहा कि किसी विचारक की वास्तविक स्मृति केवल प्रतिमा पर माल्यार्पण में नहीं, बल्कि उसके विचारों को व्यवहार और सामाजिक सेवा में उतारने में होती है। इसी भाव के साथ कार्यकर्ताओं ने राष्ट्र और समाज की सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
पाकुड़ में जुटे कार्यकर्ता, एक साथ दिखी संगठन की तस्वीर
कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य मीरा प्रवीण सिंह, दुर्गा मरांडी, पूर्व जिलाध्यक्ष अनुग्राहित प्रसाद साह, विवेकानंद तिवारी, अमृत पांडेय, वार्ड पार्षद अनिकेत गोस्वामी, गुड्डू कुमार भगत, पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष सम्पा साहा, पार्वती देवी, सुशील साहा, धर्मेंद्र त्रिवेदी, पंकज साह, मुस्ताक खान, जितेन्द्र गुप्ता, तोहिद शेख, पप्पू शेख सहित अन्य कार्यकर्ता मौजूद रहे।
एक जयंती, कई सवाल और एक पुराना विचार
दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का यह आयोजन अपने भीतर केवल स्मृति का भाव नहीं रखता, बल्कि उस राजनीतिक दर्शन की याद भी दिलाता है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति को विकास की चर्चा के केंद्र में रखने की बात कही गई। रानी दिग्घी में प्रतिमा के सामने अर्पित किए गए पुष्पों के साथ कार्यकर्ताओं ने जिस संकल्प को दोहराया, उसका वास्तविक अर्थ सेवा, सामाजिक सहभागिता और अंत्योदय के विचार को व्यवहार में उतारने की कोशिश में निहित है।


