Friday, April 24, 2026
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एडिटर इन चीफ
धर्मेन्द्र सिंह

विजयोत्सव में गूंजा वीरता का इतिहास: 80 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों को धूल चटाने वाले बाबू वीर कुंवर सिंह को शत-शत नमन

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विजयोत्सव दिवस पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि

पाकुड़। विजयोत्सव दिवस के पावन अवसर पर वीरता और शौर्य के प्रतीक बाबू वीर कुंवर सिंह को कोटिशः नमन करते हुए स्थानीय स्तर पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनके अद्वितीय साहस और देशभक्ति को याद करते हुए भावपूर्ण शब्दों में श्रद्धांजलि दी।


⚔️ 1857 की क्रांति के महानायक

कालखंड (1777-1858) में जन्मे बाबू वीर कुंवर सिंह बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर के एक प्रतिष्ठित राजपूत जमींदार थे, जिन्होंने 1857 की प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस दौर में जब अंग्रेजी सत्ता पूरे भारत पर हावी थी, तब उन्होंने अपने अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल से अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।


गोरिल्ला युद्ध नीति से अंग्रेजों को चौंकाया

बाबू कुंवर सिंह की सबसे बड़ी विशेषता उनकी गोरिल्ला (छापामार) युद्ध नीति थी। उन्होंने इस रणनीति का उपयोग कर अंग्रेजों को कई मोर्चों पर पराजित किया। आरा और जगदीशपुर जैसे क्षेत्रों में उन्होंने अंग्रेजी सेना को धूल चटाई। इसके साथ ही आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर और गोरखपुर में भी उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को करारा जवाब दिया।


अद्भुत बलिदान: खुद की बांह काटकर गंगा को समर्पित

उनके जीवन की सबसे प्रेरणादायक घटना तब सामने आई जब वे गंगा नदी पार कर रहे थे और अंग्रेजों की गोली उनके बाएं हाथ में लग गई। संक्रमण फैलने के खतरे को देखते हुए उन्होंने तलवार से अपनी ही घायल बांह काटकर गंगा में विसर्जित कर दी। यह घटना उनके अद्वितीय साहस और त्याग का प्रतीक बन गई, जो आज भी लोगों को प्रेरित करती है।


जगदीशपुर किले पर पुनः विजय और वीरगति

23 अप्रैल 1858 को बाबू कुंवर सिंह ने जगदीशपुर किले पर पुनः विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया। हालांकि, इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही दिनों बाद 26 अप्रैल 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी इस अंतिम विजय को आज भी विजयोत्सव दिवस के रूप में मनाया जाता है।


“बिहार का शेर” के नाम से प्रसिद्ध

बाबू कुंवर सिंह को उनके अद्भुत पराक्रम के कारण “बिहार का शेर” और “बाबू साहब” के नाम से भी जाना जाता है। 80 वर्ष की आयु में जिस तरह उन्होंने युद्धभूमि में उतरकर अंग्रेजों से लोहा लिया, वह उन्हें 1857 के सभी नायकों में अद्वितीय बनाता है।


राष्ट्र आज भी करता है गर्व

भारत सरकार द्वारा 23 अप्रैल को विजयोत्सव दिवस के रूप में मान्यता देना इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्र आज भी उनके योगदान को गौरव और सम्मान के साथ याद करता है। उनका जीवन संघर्ष, स्वाभिमान और देशभक्ति की मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।


👥 कार्यक्रम में रही उल्लेखनीय उपस्थिति

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भागीरथ तिवारी, कैलाश झा, संजय कुमार शुक्ला, प्रवीण कुमार सिंह, अरुण कुमार सिंह, सोहन कुमार सिंह, कुंदन सिंह, रामदेव मंडल सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर बाबू कुंवर सिंह के आदर्शों को अपनाने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।


अमर रहेंगे वीर कुंवर सिंह

बाबू वीर कुंवर सिंह का जीवन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनकी वीरता, त्याग और राष्ट्रप्रेम की गाथाएं सदियों तक लोगों को प्रेरित करती रहेंगी।
विजयोत्सव दिवस पर उन्हें शत-शत नमन! 🙏🌷

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