पद्म भूषण सम्मान पर झारखंड में गौरव और उत्साह का माहौल
पाकुड़। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म भूषण से दिशोम गुरु शिबू सोरेन को सम्मानित किए जाने पर पूरे झारखंड में खुशी और गौरव का माहौल है। इस ऐतिहासिक अवसर पर झामुमो के पूर्व केंद्रीय समिति सदस्य शाहिद इकबाल ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि झारखंड के लंबे संघर्ष, जनआंदोलन, त्याग, समर्पण और सामाजिक न्याय की उस विचारधारा का सम्मान है, जिसने राज्य की पहचान और अस्मिता को नई दिशा प्रदान की।
उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु ने अपना पूरा जीवन समाज के वंचित, शोषित और अधिकारों से वंचित लोगों की आवाज बनने में समर्पित कर दिया। उनके संघर्षों की बदौलत झारखंड आंदोलन को मजबूती मिली और अंततः अलग झारखंड राज्य का सपना साकार हुआ।
झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे दिशोम गुरु
शाहिद इकबाल ने कहा कि शिबू सोरेन केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे झारखंड की जनता की भावनाओं, आकांक्षाओं और अधिकारों के प्रतीक थे। उन्होंने दशकों तक जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया तथा आदिवासी एवं मूलवासी समाज को उनके अधिकार दिलाने के लिए निरंतर आंदोलन चलाया।
उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य के निर्माण में दिशोम गुरु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने और उसे जनआंदोलन का स्वरूप देने में उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा। यही कारण है कि आज उन्हें मिला यह सम्मान पूरे राज्य के लोगों के लिए गर्व का विषय बन गया है।
राष्ट्रपति ने प्रदान किया पद्म भूषण सम्मान
शाहिद इकबाल ने कहा कि यह पूरे झारखंड के लिए गौरव का क्षण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने करकमलों से यह प्रतिष्ठित सम्मान रूपी सोरेन को प्रदान किया। यह सम्मान उस लंबे संघर्ष और सामाजिक योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है, जिसे दिशोम गुरु ने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया था।
उन्होंने कहा कि किसी भी जननायक के लिए इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता कि उनके द्वारा किए गए कार्यों को देश सम्मानपूर्वक स्वीकार करे और आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्हें प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करे।
जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को दी नई दिशा
अपने वक्तव्य में शाहिद इकबाल ने कहा कि दिशोम गुरु ने सदैव आदिवासी और मूलवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने जंगलों, प्राकृतिक संसाधनों और भूमि पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की आवाज बुलंद की तथा सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए लगातार आंदोलन किए।
उनका मानना था कि विकास की प्रक्रिया में समाज के कमजोर वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन जनसेवा और जनहित के कार्यों में समर्पित कर दिया।
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं गुरुजी
शाहिद इकबाल ने कहा कि दिशोम गुरु का जीवन संघर्ष, साहस, दूरदर्शिता और समर्पण की अद्भुत मिसाल है। उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों को समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक कार्य करने की प्रेरणा देता रहेगा।
उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को गुरुजी के जीवन से सीख लेने की आवश्यकता है। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और समाज के हितों के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। उनका जीवन यह संदेश देता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और जनसेवा की भावना से बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
विचारों में आज भी जीवित हैं दिशोम गुरु
शाहिद इकबाल ने कहा कि भले ही आज दिशोम गुरु हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, सिद्धांत और सपने आज भी प्रत्येक झारखंडवासी के दिल में जीवित हैं। उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर ही सामाजिक न्याय, समानता और जनकल्याण के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि गुरुजी का संघर्ष केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और सम्मान पहुंचाने का अभियान था। यही कारण है कि उनका नाम झारखंड के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
झारखंडवासियों को दी बधाई, गुरुजी को किया नमन
अपने संदेश के अंत में शाहिद इकबाल ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पद्म भूषण सम्मान उनके असाधारण योगदान का राष्ट्रीय सम्मान है। उन्होंने इस गौरवपूर्ण उपलब्धि के लिए पूरे झारखंडवासियों को हार्दिक बधाई दी।
उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु का संघर्ष, उनका त्याग और उनकी जनसेवा की विरासत सदैव जीवित रहेगी। झारखंड की आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राज्य के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी।
झारखंड की अस्मिता को मिला राष्ट्रीय मंच
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिला पद्म भूषण सम्मान केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, संस्कृति, संघर्ष और जनभावनाओं की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति का प्रतीक है। यह सम्मान उन लाखों लोगों की भावनाओं से जुड़ा है जिन्होंने झारखंड आंदोलन को मजबूत बनाने में योगदान दिया और एक अलग राज्य के सपने को साकार होते देखा।
राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों का मानना है कि यह सम्मान झारखंड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा और आने वाले वर्षों तक लोगों को प्रेरित करता रहेगा।


