पाकुड़। न्याय की राह केवल अदालत की चौखट से होकर नहीं गुजरती, बल्कि उसकी पहली सीढ़ी नागरिकों में अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता से बनती है। जब कानून का ज्ञान समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है, तब अधिकार महज किताबों के शब्द नहीं रहते, बल्कि जीवन की सुरक्षा और सम्मान का आधार बन जाते हैं। इसी सोच को जमीन पर उतारते हुए झालसा, रांची के निर्देश पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के तत्वावधान में महेशपुर प्रखंड के दो अलग-अलग स्थानों पर विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ दिवाकर पांडेय के निर्देश तथा डालसा सचिव रूपा बंदना किरो के मार्गदर्शन में आयोजित इन कार्यक्रमों में लीगल लिटरेसी क्लब, आरके+2 उच्च विद्यालय, महेशपुर और चंडालमारा पंचायत भवन में छात्र-छात्राओं एवं ग्रामीणों को कानून की बुनियादी समझ से लेकर रोजमर्रा के जीवन में उससे जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के सहायक अज़फर हुसैन विश्वास ने छात्राओं को मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्यों की जानकारी देते हुए बताया कि लोकतंत्र में अधिकार व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का आधार देते हैं, वहीं कर्तव्य उसे समाज के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं। उन्होंने विभिन्न कानूनी प्रावधानों की जानकारी देते हुए छात्राओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने और किसी भी प्रकार के अन्याय की स्थिति में कानूनी सहायता लेने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के माध्यम से उपलब्ध निःशुल्क कानूनी सहायता की जानकारी भी दी। साथ ही नालसा के टोल-फ्री नंबर 15100 और नालसा की विभिन्न योजनाओं के बारे में बताया गया, ताकि आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी न्याय पाने के अधिकार से वंचित न रहे। संदेश स्पष्ट था—न्याय किसी की आर्थिक हैसियत का मोहताज नहीं होना चाहिए।
स्थायी लोक अदालत के सदस्य मो. अबरारुल हक ने लोक अदालत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विवादों के शांतिपूर्ण और सुलहपूर्ण समाधान की दिशा में लोक अदालत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने बाल विवाह और बाल मजदूरी जैसी सामाजिक कुरीतियों के दुष्परिणामों पर भी विस्तार से चर्चा की। उनके संबोधन में कानून और सामाजिक जिम्मेदारी का वह रिश्ता सामने आया, जहां किसी एक व्यक्ति की जागरूकता पूरे परिवार और समाज को सुरक्षित बनाने की शुरुआत कर सकती है।
शिविर के दौरान दहेज प्रथा के खिलाफ जागरूकता, शिक्षा के अधिकार और साइबर फ्रॉड से बचाव जैसे समकालीन विषयों पर भी लोगों को जानकारी दी गई। डिजिटल दौर में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच लोगों को सावधान रहने, अनजान लिंक और संदिग्ध संदेशों से बचने तथा आर्थिक धोखाधड़ी की स्थिति में तत्काल उचित कानूनी कदम उठाने के प्रति जागरूक किया गया।
बाल विवाह, बाल मजदूरी और दहेज जैसी कुरीतियों पर चर्चा ने यह भी रेखांकित किया कि कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं है। कानून समाज में सम्मान, समानता, सुरक्षा और अवसर सुनिश्चित करने का माध्यम भी है। वहीं शिक्षा के अधिकार की जानकारी ने यह संदेश दिया कि किसी बच्चे के हाथ में किताब होना केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि उसके भविष्य और गरिमा का सवाल भी है।
कार्यक्रम में पंचायत की मुखिया सनमती मरांडी, पैरा लीगल वॉलंटियर्स पिंटू मरांडी, मणिलाल हेंब्रम, प्रियंका हेंब्रम एवं उर्मिला हेंब्रम सहित विद्यालय के प्राचार्य, शिक्षक-शिक्षिकाएं और छात्राएं मौजूद रहीं।
महेशपुर में आयोजित यह विधिक जागरूकता कार्यक्रम अपने पीछे एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया—क्या हम अपने अधिकारों को उतना ही जानते हैं, जितना अपने दायित्वों को? शायद न्याय की वास्तविक शुरुआत इसी सवाल से होती है। कानून तब अधिक प्रभावी बनता है, जब वह अदालत की फाइलों से निकलकर विद्यालय के कक्ष, पंचायत भवन और आम नागरिक की समझ तक पहुंचता है। जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है और अपने कर्तव्यों के माध्यम से एक सुरक्षित, संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज की नींव रख सकता है।


