पाकुड़। कुछ लोग अपने पद के साथ पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान उनके पद से आगे बढ़कर लोगों के दिलों में दर्ज हो जाती है। दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू भी उन्हीं नामों में शुमार रहे, जिनके जाने का दर्द केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन हजारों राज्यकर्मियों के बीच भी महसूस किया गया, जिनके भविष्य और सम्मान से जुड़ी उम्मीदों को उन्होंने आवाज देने का काम किया था।
इसी भाव और कृतज्ञता के साथ पाकुड़ जिले के राज्यकर्मियों ने सिद्धू-कान्हू मुर्मू पार्क के समीप आयोजित श्रद्धांजलि सभा में दिवंगत मंत्री को भावभीनी विदाई दी। जिले के विभिन्न विभागों से पहुंचे सैकड़ों राज्यकर्मी एक जगह जुटे तो माहौल में एक अजीब-सी खामोशी उतर आई। चेहरों पर उदासी थी, आंखों में नमी और दिल में उस शख्स की याद, जिसने कर्मचारियों की वर्षों पुरानी उम्मीदों को समझने की कोशिश की थी।
श्रद्धांजलि सभा में दिवंगत मंत्री के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया गया। इसके बाद उपस्थित सभी राज्यकर्मी दो मिनट के मौन में खड़े रहे। उस खामोशी में शब्द नहीं थे, लेकिन भावनाएं बहुत कुछ कह रही थीं। मानो हर कर्मचारी अपने भीतर से यही कह रहा हो कि कुछ योगदान समय के साथ भुलाए नहीं जाते, वे स्मृतियों का हिस्सा बनकर हमेशा जीवित रहते हैं।
पुरानी पेंशन की उम्मीद से जुड़ा एक नाम
राज्यकर्मियों ने कहा कि सुदिव्य कुमार सोनू का नाम उनके लिए सिर्फ एक मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि कर्मचारी हितों की आवाज के रूप में याद किया जाएगा। विशेष रूप से पुरानी पेंशन व्यवस्था की बहाली की दिशा में उनकी भूमिका को कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण बताया।
कर्मचारियों के लिए पेंशन महज सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली आर्थिक सहायता नहीं है। यह वर्षों की सेवा के बाद मिलने वाली सुरक्षा, सम्मान और भविष्य के भरोसे का दूसरा नाम है। ऐसे में जब किसी जनप्रतिनिधि की पहल उस उम्मीद को मजबूती देती है, तो उसके साथ एक भावनात्मक रिश्ता भी बन जाता है। शायद यही वजह रही कि सुदिव्य सोनू के निधन का समाचार कर्मचारियों के बीच एक व्यक्तिगत क्षति की तरह महसूस किया गया।
सभा में मौजूद राज्यकर्मियों ने कहा कि दिवंगत मंत्री ने कर्मचारियों की भावनाओं और उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग को समझा। पुरानी पेंशन बहाली की दिशा में उनकी पहल ने कर्मचारियों के भीतर एक नई उम्मीद जगाई। यही उम्मीद आज उनकी स्मृति के साथ एक गहरी कृतज्ञता में बदल गई है।
तस्वीर सामने थी, यादें दिल में थीं
श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अलग-अलग विभागों से पहुंचे कर्मचारियों की मौजूदगी केवल संख्या नहीं थी। यह उस सम्मान का प्रमाण थी, जो किसी पद से नहीं, बल्कि किए गए काम से अर्जित होता है। सामने सुदिव्य सोनू की तस्वीर थी और उसके चारों ओर रखे फूल उनकी स्मृतियों को जैसे शब्द दे रहे थे।
किसी के चेहरे पर उदासी थी तो कोई मौन खड़ा था। किसी की आंखें तस्वीर पर टिकी थीं, तो कोई सिर झुकाए बीते दिनों को याद कर रहा था। पूरा वातावरण भावुक था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ क्षणों के लिए समय ठहर गया हो और हर कोई अपने-अपने तरीके से उस व्यक्तित्व को अंतिम नमन कर रहा हो, जिसने कर्मचारियों के भविष्य से जुड़े सवालों को अपनी आवाज दी थी।
“कुछ लोग पद पर रहते हैं, कुछ दिलों में”
श्रद्धांजलि सभा में शिक्षक शमसेर आलम ने कहा कि कुछ लोग पद पर रहते हुए काम करते हैं, लेकिन कुछ अपने काम से लोगों के दिलों में ऐसी जगह बना लेते हैं, जहां से वे कभी विदा नहीं होते। सुदिव्य कुमार सोनू को राज्यकर्मियों की यह श्रद्धांजलि उसी सम्मान और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
उनके शब्दों में शायद इस पूरी सभा का सार छिपा था। क्योंकि किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि लोगों की स्मृतियों में बचा उसका काम होता है।
खामोशी में भी सुनाई दी उम्मीद की आवाज
कार्यक्रम के अंत में राज्यकर्मियों ने दिवंगत मंत्री के योगदान को याद करते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने तथा कर्मचारी हितों के प्रति एकजुट रहने का संकल्प लिया।
दो मिनट का मौन समाप्त हुआ, लोग अपने-अपने रास्ते लौट गए, लेकिन उस शाम की खामोशी शायद इतनी आसानी से खत्म नहीं हुई। सिद्धू-कान्हू मुर्मू पार्क के पास आयोजित वह श्रद्धांजलि सभा अपने पीछे एक सवाल, एक स्मृति और एक उम्मीद छोड़ गई—क्या किसी व्यक्ति का जाना उसकी आवाज को भी खत्म कर देता है?
शायद नहीं।
क्योंकि कुछ आवाजें व्यक्ति के साथ नहीं जातीं। वे उन लोगों की यादों में जीवित रहती हैं, जिनके लिए उन्होंने आवाज उठाई थी। सुदिव्य कुमार सोनू की स्मृति में पाकुड़ के राज्यकर्मियों का यह मौन नमन भी उसी जीवित आवाज की गवाही बन गया।


