पाकुड़। लोकतंत्र की असली ताकत जनता की आवाज में होती है और जब इसी आवाज को दबाने के आरोप सामने आने लगें, तो सत्ता की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विरोध, असहमति और सवाल पूछने के अधिकार को लेकर झारखंड कांग्रेस के पीसीसी कोऑर्डिनेटर सह पाकुड़ जिला प्रभारी उदय लखमानी ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में छात्रों, युवाओं, वकीलों और पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, लोकतंत्र की रक्षा केवल संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
लोकतांत्रिक अधिकारों पर उठाए सवाल
उदय लखमानी ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध करना और सरकार से सवाल पूछना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। यदि अपनी बात रखने वाले छात्रों, युवाओं, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लेने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध की आवाजों को दबाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। सरकार को असहमति को विरोधी भावना के बजाय लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।
SIR और वोट कटने के आरोप पर चुनाव आयोग से सवाल
कांग्रेस नेता ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से उठाए गए कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे का उल्लेख करते हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोपों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
लखमानी ने चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मताधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधित करने की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी तथा जवाबदेह होनी चाहिए, ताकि किसी भी पात्र नागरिक को अपने मताधिकार से वंचित होने की आशंका न रहे।
दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी घेरा
उदय लखमानी ने दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं के प्रति कठोर रवैया अपनाया जा रहा है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार अपने ही देश के नागरिकों और युवाओं की आवाज से असहज हो रही है? उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का जवाब संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए, न कि डर और दमन के आरोपों को जन्म देने वाली कार्रवाई से।
मीडिया की भूमिका पर भी जताई नाराजगी
कांग्रेस नेता ने मीडिया के एक वर्ग की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को आतंकवादियों से जोड़कर देखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, जनता की समस्याओं को सामने लाना और निष्पक्ष तरीके से तथ्यों को प्रस्तुत करना है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि सवाल पूछने वाले युवाओं को देशद्रोही ठहराना पत्रकारिता के मूल्यों के विपरीत है। लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि स्वतंत्र पत्रकारिता ही जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का एक प्रमुख माध्यम है।
अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसे के साथ जनता की भूमिका भी अहम
उदय लखमानी ने कहा कि देश के लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी केवल अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं पर छोड़कर नागरिक अपनी भूमिका से पीछे नहीं हट सकते। उन्होंने 1975 के आपातकाल और उस दौर में न्यायपालिका की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास से लोकतांत्रिक संस्थाओं की सीमाओं और नागरिक अधिकारों के महत्व को समझने की जरूरत है।
उन्होंने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी शिकायतों पर न्यायिक टिप्पणियों को लेकर भी निराशा जताई और कहा कि प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की रक्षा गंभीरता से होनी चाहिए। उनके अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती तभी सुनिश्चित होगी, जब संस्थाएं निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप काम करेंगी।
‘जनता की अदालत’ को बताया लोकतंत्र की असली ताकत
अपने बयान के अंत में उदय लखमानी ने कहा कि लोकतंत्र केवल संसद, सरकार या किसी एक संवैधानिक संस्था तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति देश के नागरिकों में निहित है। जब भी लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मताधिकार को लेकर सवाल खड़े हों, तब जनता को जागरूक होकर संवैधानिक दायरे में अपनी आवाज उठानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए नागरिकों की सजगता, शांतिपूर्ण जनभागीदारी और संस्थाओं की जवाबदेही जरूरी है। लोकतंत्र तभी जीवंत रहता है, जब जनता को सवाल पूछने, असहमति जताने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की पूरी स्वतंत्रता मिले।
उदय लखमानी का संदेश स्पष्ट है—लोकतंत्र की मजबूती केवल सत्ता के फैसलों से नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता, नागरिक अधिकारों के सम्मान और जवाबदेह व्यवस्था से तय होती है।


