जब इंसाफ़ ख़ुद चलकर पहुँचा कारा के द्वार
पाकुड़। झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (JHALSA), रांची के निर्देशानुसार गुरुवार को व्यवहार न्यायालय पाकुड़ परिसर में विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति (UTRC) की चौथी बैठक आयोजित हुई। अध्यक्षता प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, दिवाकर पांडेय ने की। बैठक का एजेंडा सीधा था: कोई भी बंदी फ़ाइलों के ढेर में गुम न हो जाए।
मंच पर एकजुट रहा पूरा प्रशासनिक तंत्र
बैठक में उपायुक्त सह उपाध्यक्ष, डालसा पाकुड़, मेघा भारद्वाज, पुलिस अधीक्षक सह सदस्य, डालसा पाकुड़, अनुदीप सिंह, डालसा सचिव रूपा बंदना किरो और मंडल कारा पाकुड़ के जेल अधीक्षक उपस्थित रहे। न्याय, प्रशासन और पुलिस, तीनों एक मेज़ पर बैठे और बंदियों के भविष्य पर साझा चिंतन हुआ।
बीमार, बुज़ुर्ग और बेबस: सबसे पहले इन पर नज़र
समिति ने मंडल कारा पाकुड़ में बंद विचाराधीन बंदियों के मामलों की गहन समीक्षा की। विशेष ध्यान उन बंदियों पर रहा जो गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, उम्र के ढलान पर हैं, या जमानत मिलने के बावजूद जमानतदार न जुटा पाने के कारण जेल में हैं। जो बंदी जमानत के योग्य पाए गए, उनके मामलों पर चर्चा कर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए।
16 श्रेणियों की कसौटी पर परखे गए मामले
झालसा द्वारा निर्धारित 16 श्रेणियों में से श्रेणी संख्या चार, यानी आपराधिक शमनीय (क्रिमिनल कंपाउंडेबल) वादों की पड़ताल की गई। इसके तहत 15 विचाराधीन बंदियों की पहचान हुई और उन पर शीघ्र एवं उचित कार्रवाई के निर्देश दिए गए। यानी कई बंदियों के लिए रिहाई की राह अब पहले से कहीं करीब है।
“कानून की अनभिज्ञता सज़ा न बने”: प्रधान जिला न्यायाधीश
बैठक को संबोधित करते हुए प्रधान जिला न्यायाधीश दिवाकर पांडेय ने कहा कि झालसा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी गरीब और असहाय विचाराधीन बंदी केवल कानूनी जानकारी के अभाव में जेल में न रहे। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी योग्य मामलों में विधिक सहायता उपलब्ध कराकर रिहाई की प्रक्रिया को गति दी जाए।


