पाकुड़। उम्र के उस पड़ाव पर जब माता-पिता को संतान के सहारे, सम्मान और देखभाल की सबसे अधिक जरूरत होती है, उस समय उन्हें अकेला छोड़ देना केवल सामाजिक संवेदना का सवाल नहीं, बल्कि कानून की नजर में भी गंभीर विषय है। इसी संदेश को गांव-गांव तक पहुंचाने के उद्देश्य से जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ की ओर से रविवार को वरिष्ठ नागरिकों और असहाय माता-पिता के अधिकारों को लेकर व्यापक विधिक जागरूकता अभियान चलाया गया।
कानून की जानकारी बनी बुजुर्गों के लिए सहारे की आवाज
जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ के तत्वावधान में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार दिवाकर पांडेय के निर्देश पर तथा डालसा सचिव रूपा बंदना किरो के मार्गदर्शन में यह अभियान आयोजित किया गया। अभियान का उद्देश्य माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के प्रावधानों की जानकारी देकर बुजुर्गों और असहाय माता-पिता को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना रहा।
गांव-गांव पहुंचा डालसा, घर-घर दी गई कानूनी जानकारी
जिले के सभी प्रखंडों के ग्रामीण क्षेत्रों में पैरा लीगल वॉलंटियर्स ने पहुंचकर लोगों को कानून की जानकारी दी। शहरकोल, बासमती, हीरानंदपुर, बाबूपुर, सोनाजोड़ी, डांगापाड़ा, डोमनगड़ियां, पकड़ीपाड़ा, गंधाईपुर, लेटबाड़ी, रोलाग्राम सहित लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, पाकुड़िया, हिरणपुर, आमड़ापाड़ा, धरमपुर मोड़ और बिपतपुर समेत विभिन्न क्षेत्रों में अभियान चलाया गया। खासकर आदिवासी बहुल इलाकों में घर-घर पहुंचकर वरिष्ठ नागरिकों से संवाद किया गया।
संतान से भरण-पोषण मांगना माता-पिता का कानूनी अधिकार
अभियान के दौरान पैरा लीगल वॉलंटियर्स ने बताया कि माता-पिता चाहे वे सगे, गोद लिए हुए या सौतेले हों और 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक अपने वयस्क बेटे-बेटी अथवा कानूनी वारिसों से भरण-पोषण पाने के हकदार हैं। भरण-पोषण में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि वस्त्र, आवास, चिकित्सा उपचार और आवश्यक देखभाल भी शामिल है।
संपत्ति देकर भी अगर सेवा से मुकर गए तो कानून देगा सुरक्षा
वरिष्ठ नागरिकों को संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े अधिकारों की भी जानकारी दी गई। बताया गया कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने इस शर्त पर अपनी संपत्ति बच्चों या रिश्तेदारों को हस्तांतरित की है कि वे उनकी देखभाल करेंगे और बाद में वे देखभाल से मुकर जाते हैं, तो अधिनियम की धारा 23 के तहत भरण-पोषण ट्रिब्यूनल उस संपत्ति हस्तांतरण को अवैध घोषित करने की कार्रवाई कर सकता है।
न्याय के लिए भारी फीस और लंबी प्रक्रिया जरूरी नहीं
पैरा लीगल वॉलंटियर्स ने ग्रामीणों को यह भी बताया कि वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों के लिए भरण-पोषण ट्रिब्यूनल की व्यवस्था की गई है। जिला स्तर पर संबंधित अनुमंडल पदाधिकारी (SDO/SDM) ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष होते हैं। इसके लिए भारी-भरकम फीस या अनिवार्य रूप से वकील रखने की आवश्यकता नहीं होती। नोटिस की तामील के बाद निर्धारित अवधि में मामले के निपटारे का प्रावधान भी कानून में किया गया है।
बेसहारा छोड़ने पर हो सकती है सजा और जुर्माना
अभियान के दौरान बुजुर्गों को कानून के दंडात्मक प्रावधानों से भी अवगत कराया गया। बताया गया कि वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता को जानबूझकर बेसहारा छोड़ने की स्थिति में कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है, जिसमें तीन महीने तक की जेल या पांच हजार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान बताया गया। ट्रिब्यूनल के आदेश का पालन नहीं करने पर आगे की कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
14567 पर मिलेगी वरिष्ठ नागरिकों को मदद
जागरूकता अभियान के दौरान राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन Elder Line 14567 की जानकारी भी ग्रामीणों को दी गई। साथ ही बताया गया कि जरूरतमंद लोग जिला विधिक सेवा प्राधिकार के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह संदेश देना रहा कि आर्थिक या सामाजिक मजबूरी किसी बुजुर्ग को न्याय और कानूनी सहायता से दूर नहीं कर सकती।
पैरा लीगल वॉलंटियर्स ने निभाई अहम भूमिका
अभियान को सफल बनाने में पैरा लीगल वॉलंटियर्स नसीम अंसारी, मनोज सोरेन, याकूब अली, कमला राय गांगुली, लक्ष्मी कुमारी, चंद्र शेखर घोष, किंग्सुक नाग, सुजाता घोष, खुदू राजवंशी, मीरु बेसरा, मल्लिका सरकार, मरियम पिंकी किस्कू, पिंटू मरांडी, सीमा साहा, रानी साहा, सायेम अली, भरत कुमार साहा, मणिलाल हेंब्रम, जयंती कुमारी, कान्हु हांसदा, असुंता मुर्मू, तरेसा किस्कू, आनंद मुर्मू, मोलिता कुमारी, प्रियंका हेंब्रम, उर्मिला हेंब्रम, सौरभ यादव, जयंती टुडू, सुनेमी मरांडी समेत अन्य की सक्रिय भूमिका रही।
बुढ़ापे में सम्मान और सहारा, समाज की भी जिम्मेदारी
अभियान ने यह संदेश भी दिया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। जिन हाथों ने कभी बच्चों को चलना सिखाया, उम्र के अंतिम पड़ाव में उन्हीं हाथों को सहारे की जरूरत होती है। डालसा की यह पहल कानून की जानकारी के साथ उस संवेदना को भी मजबूत करने का प्रयास है, जिसमें बुजुर्गों को उनके घर और समाज में सम्मान, सुरक्षा और अधिकार मिल सके।


