Wednesday, April 22, 2026
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धर्मेन्द्र सिंह

भोजपुरी में पढ़ें – चतुर्मास चलता, एकर महातम ह अपरंपार

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चतुर्मास सुरू बा. एबेरी अधिकामास के कारन ई 29 जून से 23 नवंबर 2023 ले रही. कहाई चतुर्मास बाकिर रही पांच महीना ले. एकर महातम हमनी का लइकाइएं से सुनत आवतानी जा. आषाढ़ सनातन कैलेंडर के चौथा महीना ह. एही महीना के अंजोरिया (शुक्ल पक्ष) के एकादशी से चतुर्मास सुरू होला. रउरा सब जानते बानी कि जब चतुर्मास सुरू होला त एकरा के देवशयनी एकादशी आ जब खतम होला त एकरा के देवउठनी एकादशी कहल जाला. लइकाईं में लागी कि ‘देवशयनी’ आ ‘देवउठनी’ शब्द भोजपुरी ह. बड़ भइला पर पता चलल कि हिंदी में ‘देवउठनी’ के ‘देवोत्थान’ एकादशी कहल जाला. देवशयनी का दिने भगवान विष्णुजी योगनिद्रा में सूते चल जाले.

विष्णु जी संसार के पालन करेले. ऊ सूत जइहन त देखभाल के करी? त एकर जिम्मा भगवान शिव जी अपना ऊपर ले लेले. उनका के ठीके ‘करुणावतारं’ कहल जाला. कहाले मृत्यु के देवता बाकिर करुणा अतना ढेर कि जब विष्णु जी योगनिद्रा में सूते चलि गइले त शिवजी संसार के पालन करे खातिर कैलाश पर्वत से धरती पर आ जाले. एही घरी सावन के सोमारी परेला आ लोग अघा के शिवजी पर जल, मदार के फूल, बेलपत्तर चढ़ावेला. कतने लोग एही समय महारुद्राभिषेक करावेला. काहें से कि केहू पर कतनो कठिन ग्रह होखे, जदि एह चतुर्मास में रुद्राभिषेक करा दी त ओकरा पर से कठिनाई के दबाव कम हो जाई.

चतुर्मास के बड़ा रोचक कथा बा. राजा बलि जब तीनों लोक पर आपन अधिकार क लिहले आ जब ऊ सौवां यज्ञ करे लगले त इंद्र भगवान घबड़ा के इंद्र भगवान का लगे दउरले. इंद्र भगवान भगवान विष्णु से सहायता मंगले. तब विष्णु भगवान वामन अवतार लेके राजा बलि से दान में तीन डेग धरती मंगले. शुक्राचार्यऊ त अपने चाल्हाक. ऊ राजा बलि से कहले कि सावधान हो जा. ई वामन ना हउवन, भगवान हउवन. दान देबे के हामी मत भर. बाकिर बलि ना मनले आ तीन डेग धरती देबे के तैयार हो गइले. भगवान विष्णु दुइए डेग में धरती नापि दिहले. बलि त ई देख के अचकचा गइले. एगो बौना आदमी ईहो क सकेला?

बलि कहले कि प्रभु अब त हमार कपारे बांचल बा. ईहे लेलीं. बलि के ई बात सुनि के भगवान खुस भइले आ उनका के पाताल लोक के राजा बना दिहले. एकरा बाद भगवान विष्णु कहले कि बलि तूं हमरा से वर मांग. राजा बलि वरदान मंगले कि रउरा (भगवान विष्णु) हमरा संगे पाताल लोक में चलि के रहीं. भगवान अपना भक्त के प्रेम के वश में आ गइले आ पाताल लोक चलि गइले. एकरा कारन एने सब देवी- देवता आ माता लक्ष्मी जी चिंतित हो गइल लोग कि भगवान पाताल में रहिहें त अउरी कुल काम कइसे होई? एकर उपाय माता लक्ष्मी निकलली. ऊ एगो गरीब औरत के भेष में पाताल लोक में राजा बलि का लगे गइली आ उनका के भाई बना के राखी बांध दिहली.

राजा बलि कहले कि बहिन राखि के बदला में तूं कुछ मांग. गरीब महिला के भेष में माता लक्ष्मी कहली कि हम चाहतानी कि भगवान विष्णु के अपना संगे ले जाईं. राजा बलि ना चाहते हुए भी भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी के संगे जाए के अनुमति दे दिहले. बलि के मन के बात भगवान विष्णु जानि गइले. ऊ बलि से कहले कि तूं चिंता मत कर. हम आषाढ़ से लेके कातिक महीना ले तोहरा संगे रहब. बाकी दिन लक्ष्मी जी का संगे रहब. त रउरा सब जानते बानी कि भगवान कबो सूतस ना. सदा जाग्रत रहेले. बाकिर चूंकि ऊ पाताल लोक चल जाले, एही से एह प्रक्रिया के योगनिद्रा कहल जाला.

आ करुणासागर भगवान शिवजी के देखीं. जब समुद्र मंथन भइल त ओमें से पृथ्वी के जीवन के नाश करे वाला हलाहल विष निकलल. भगवान शिव हमनी के आ पृथ्वी के जीव- जंतु बचावे खातिर ओह विष के खुद पी लिहले आ ओकरा के गला में अंटका दिहले. उनकर गला विष के प्रभाव से नीला रंग के हो गइल त उनकर नांव परल नीलकंठ. राजा भगीरथ जब गंगा माता के पृथ्वी पर ले अइले त उनकर वेग से पृथ्वी के नष्ट होखे के डर रहे. ओइजो ऊ गंगा जी के अपना जटा में उलझा दिहले त उनकर भयंकर वेग संभार में आ गइल. अब एह चतुर्मास में शिवजी संसार के पालन- पोषण करे आ जाले. त रउरा मन में सवाल उठत होई कि तब शिवजी के मृत्यु के देवता काहें कहाला?

त सरकार बड़े- बड़े महात्मा लोग कहि गइल बा कि मृत्यु ना होई त ओह जीव के नया शरीर ना मिली. ओकरा बूढ़ आ व्याधियुक्त शरीर में रहे के परी. एही से मृत्यु के रूप में शिवजी जीव के उद्धार करेले. दोसर बात कि शिवजी जीव के दुख, परेशानी, कष्ट, रोग- व्याधि के भी मार देले. एही से शिव भक्त लोग आनंद में रहेला. शिव भक्त लोगन के कहनाम ह कि जब बाबा भोलेनाथ हमार देख- रेख करते बाड़े, त हमरा चिंता के कौन काम बा? जौन कठिनाई आई शिवजी पार क दीहें, ओकरा के खतम क दीहें. त आईं करुणासागर, अनंत, निराकार, भक्त खातिर ज्योति स्वरूप- भगवान शिव के एह चतुर्मास में भक्ति कइल जाउ आ उनकर आसीरबाद लेके आनंद कइल जाउ.

(डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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