पाकुड़। शिक्षा का अर्थ केवल किताबों के पन्नों पर लिखे अक्षरों को पढ़ना और परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं है, बल्कि जीवन की चुनौतियों को समझना, अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना और समाज में व्याप्त बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस जुटाना भी है। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखते हुए झालसा, रांची के निर्देशन में जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा), पाकुड़ की ओर से प्लस टू प्रोजेक्ट उच्च विद्यालय, बड़कियारी में विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में बच्चों को कानून, सुरक्षा, सामाजिक कुरीतियों और शिक्षा के महत्व से जुड़ी ऐसी जानकारियां दी गईं, जो उनके जीवन को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
बच्चों की सुरक्षा का सवाल, चुप्पी नहीं जागरूकता है जरूरी
कार्यक्रम में स्थायी लोक अदालत के सदस्य राजीव कुमार झा ने बच्चों को पोक्सो एक्ट के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बीच अंतर समझाते हुए बताया कि अपने शरीर की सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना कितना आवश्यक है। उन्होंने बच्चों से कहा कि यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से स्पर्श करता है या असहज महसूस कराता है, तो डरकर चुप नहीं रहना चाहिए। ऐसी स्थिति में अपने माता-पिता, शिक्षक या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को अवश्य बताना चाहिए। संदेश स्पष्ट था कि बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जवाबदेही है।
डायन प्रथा और दहेज जैसी कुरीतियों पर कानून की रोशनी
समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधाओं में अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां शामिल हैं। राजीव कुमार झा ने डायन प्रथा और दहेज प्रथा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते हुए विद्यार्थियों को इनके दुष्परिणामों से अवगत कराया। उन्होंने समझाया कि अंधविश्वास के नाम पर किसी महिला को प्रताड़ित करना मानवता और सामाजिक न्याय दोनों के विरुद्ध है। वहीं दहेज जैसी कुप्रथा परिवारों को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर करती है। समाज तभी सभ्य और विकसित बन सकता है, जब महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार प्राप्त हों।
बाल विवाह: बचपन के सपनों पर समय से पहले जिम्मेदारियों का बोझ
एलएडीसीएस के डिप्टी चीफ संजीव कुमार मंडल ने बाल विवाह और डायन प्रथा के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बाल विवाह बच्चों के शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में विवाह की जिम्मेदारियां सौंप देना उनके भविष्य के साथ अन्याय है। उन्होंने विद्यार्थियों को अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने तथा इनके विरुद्ध जागरूकता फैलाने का संदेश दिया। साथ ही मौलिक अधिकारों की जानकारी देकर बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के लिए प्रेरित किया।
कानून की जानकारी हर नागरिक का अधिकार, मुफ्त सहायता का भी बताया रास्ता
शिविर में विद्यार्थियों, शिक्षकों और उपस्थित ग्रामीणों को जिला विधिक सेवा प्राधिकार के माध्यम से मिलने वाली निःशुल्क कानूनी सहायता के बारे में विस्तार से बताया गया। वक्ताओं ने समझाया कि आर्थिक कमजोरी किसी व्यक्ति को न्याय पाने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। कानूनी समस्या आने पर समाधान और सहायता के लिए नालसा के टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 15100 पर संपर्क करने की जानकारी दी गई। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों तक न्याय और कानूनी सहायता की जानकारी पहुंचाना था, ताकि कानून केवल न्यायालयों की चारदीवारी तक सीमित न रहे, बल्कि आम नागरिक के जीवन का हिस्सा बने।
सवाल-जवाब के जरिए बच्चों से हुआ सीधा संवाद
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि जागरूकता का संदेश केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा। संवाद और सवाल-जवाब के माध्यम से बच्चों को कानूनी, सामाजिक कुरीतियों और शिक्षा से जुड़े विषयों पर जागरूक किया गया। विद्यार्थियों को अपनी जिज्ञासाएं सामने रखने और विभिन्न समस्याओं को समझने का अवसर मिला। इस तरह बच्चों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि जागरूक नागरिक बनने की शुरुआत सवाल पूछने और सही-गलत को पहचानने से होती है।
शिक्षा ही वह ताकत है, जो बदल सकती है जिंदगी की तस्वीर
कार्यक्रम का संचालन करते हुए इंडियन नेशनल एसोसिएशन के अध्यक्ष विश्वास ने विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाया और शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बच्चों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति को केवल रोजगार ही नहीं देती, बल्कि उसे सम्मान, आत्मविश्वास और अपने सपनों को साकार करने की शक्ति भी प्रदान करती है। उन्होंने एलएडीसीएस के डिप्टी चीफ संजीव कुमार मंडल का उदाहरण देते हुए बताया कि वे इसी विद्यालय के पूर्व विद्यार्थी रहे हैं और आज न्यायालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह उदाहरण विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, शिक्षा और मेहनत के बल पर जीवन में ऊंचा मुकाम हासिल किया जा सकता है।
विद्यालय परिसर में दिखी जागरूकता की सामूहिक तस्वीर
इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य संजीव कुमार घोष, एसएमसी अध्यक्ष असर फुल अंसारी, शिक्षक प्रकाश मुर्मू, शिक्षिकाएं जयंती मरांडी, हुमैरा नूर, रीना किस्कू, आशिक अंसारी तथा पैरा लीगल वॉलंटियर्स मणिलाल हेंब्रम, उर्मिला हेंब्रम और नीरज कुमार राउत सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
जागरूकता की एक छोटी पहल, बदलाव की बड़ी उम्मीद
बड़कियारी विद्यालय में आयोजित यह विधिक जागरूकता शिविर केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित बचपन, सम्मानजनक समाज और अधिकारों के प्रति सजग भविष्य की ओर ले जाने का प्रयास था। जब किसी बच्चे को अच्छे-बुरे स्पर्श की पहचान होती है, जब कोई किशोर बाल विवाह के नुकसान को समझता है और जब कोई ग्रामीण अपने कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक होता है, तभी सामाजिक बदलाव की नींव मजबूत होती है। जरूरत है कि ऐसी पहलें गांव-गांव और विद्यालय-विद्यालय तक पहुंचें, ताकि अंधविश्वास की जगह विवेक, भेदभाव की जगह समानता और चुप्पी की जगह जागरूकता ले सके। आखिरकार, एक जागरूक बच्चा ही कल के संवेदनशील, जिम्मेदार और न्यायप्रिय समाज का निर्माण करता है।


