Saturday, July 18, 2026
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एडिटर इन चीफ
धर्मेन्द्र सिंह

‘₹20 लाख का विवाद… न फैसला, न सजा, फिर भी खत्म हो गया केस!’ लोक अदालत में हुआ ऐसा कि हर कोई जानना चाहता है कैसे

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📍विशेष लोक अदालत में वर्षों पुराने विवाद का सौहार्दपूर्ण अंत, बिना लंबी कानूनी लड़ाई दोनों पक्षों को मिली राहत

पाकुड़। क्या किसी ₹20 लाख के चेक बाउंस मामले का समाधान बिना लंबा फैसला आए, बिना किसी सजा और बिना वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाए भी हो सकता है? सुनने में यह असंभव लग सकता है, लेकिन पाकुड़ व्यवहार न्यायालय में आयोजित विशेष लोक अदालत ने इसे संभव कर दिखाया। यही वजह है कि इस अनोखे मामले की चर्चा अब कानूनी गलियारों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी हो रही है।

झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा), रांची के निर्देशानुसार शनिवार 18 जुलाई 2026 को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए), पाकुड़ द्वारा आयोजित विशेष लोक अदालत में ₹20 लाख के चेक अनादरण (एनआई एक्ट) से जुड़े एक लंबे समय से लंबित मामले का आपसी समझौते के आधार पर सफल निपटारा कर दिया गया। इस समझौते के बाद दोनों पक्ष राहत और संतोष के साथ न्यायालय से बाहर निकले।


💰 ₹20 लाख के चेक बाउंस से शुरू हुआ था पूरा विवाद

मामला शिकायत वाद संख्या 333/2023 से जुड़ा था, जिसमें मोहम्मद रेजाउद्दीन ने अनल सिंघा के विरुद्ध ₹20 लाख के चेक बाउंस का परिवाद दायर किया था।

मामला न्यायालय में विचाराधीन था और सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत इसके निपटारे में लंबा समय लग सकता था। लेकिन विशेष लोक अदालत ने इस विवाद को एक नई दिशा दी, जहां कानूनी लड़ाई की जगह संवाद और समझौते को प्राथमिकता दी गई।


⚖️ अदालत ने नहीं सुनाया फैसला, बल्कि दोनों पक्षों को दिया बातचीत का अवसर

इस मामले की सबसे खास बात यह रही कि न्यायालय ने केवल कानूनी प्रक्रिया तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि दोनों पक्षों को आपसी सहमति से विवाद समाप्त करने का अवसर भी दिया।

एसडीजेएम सदीश उज्जवल बेग के मार्गदर्शन में मामले को मध्यस्थता प्रकोष्ठ भेजा गया, ताकि दोनों पक्ष बैठकर अपनी बात रख सकें और ऐसा समाधान तलाशा जा सके, जिससे किसी की प्रतिष्ठा या संबंधों को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।


🤝 मध्यस्थता बनी सफलता की सबसे बड़ी कुंजी

मामले के समाधान में चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल सह मध्यस्थ धर्मेंद्र सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।

उन्होंने दोनों पक्षों की बात धैर्यपूर्वक सुनी, कानूनी स्थिति को सरल भाषा में समझाया और लगातार संवाद के माध्यम से विश्वास का वातावरण तैयार किया। कई दौर की बातचीत के बाद दोनों पक्ष आपसी समझौते के लिए तैयार हो गए।

यही कारण रहा कि वर्षों से लंबित विवाद का अंत किसी सजा या कठोर निर्णय से नहीं, बल्कि आपसी सहमति और सौहार्दपूर्ण समझौते से हुआ।


15 दिनों की तैयारी लाई बड़ा परिणाम

इस सफलता के पीछे लगातार किया गया प्रयास भी अहम रहा।

3 जुलाई से 17 जुलाई 2026 तक व्यवहार न्यायालय परिसर में प्री-लोक अदालत की नियमित बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में पक्षकारों को लोक अदालत के लाभ, समझौते की प्रक्रिया और उसके कानूनी महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया।

लगातार संवाद और सकारात्मक माहौल का परिणाम यह रहा कि विशेष लोक अदालत के दिन दोनों पक्ष विवाद समाप्त करने के लिए तैयार होकर पहुंचे।


😊 समझौते के बाद दोनों पक्षों ने ली राहत की सांस

समझौता होने के बाद दोनों पक्षों ने न्यायालय, मध्यस्थता प्रकोष्ठ और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के प्रयासों की सराहना की।

दोनों ने माना कि यदि मामला सामान्य न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहता, तो समय, धन और मानसिक तनाव कहीं अधिक बढ़ सकता था। लेकिन लोक अदालत के माध्यम से विवाद समाप्त होने से सभी पक्षों को राहत मिली।


📢 डीएलएसए की अपील—लोक अदालत का उठाएं अधिक से अधिक लाभ

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पाकुड़ ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे अपने लंबित मामलों और प्री-लिटिगेशन विवादों को लोक अदालत के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करें।

प्राधिकरण ने कहा कि लोक अदालत ऐसा मंच है, जहां निःशुल्क, त्वरित और सौहार्दपूर्ण न्याय उपलब्ध कराया जाता है। इससे न केवल न्यायालयों का बोझ कम होता है, बल्कि लोगों का समय, धन और मानसिक तनाव भी बचता है।


🌟 क्यों खास है यह मामला?

आज जब छोटे-छोटे विवाद भी वर्षों तक अदालतों में लंबित रहते हैं, ऐसे समय में ₹20 लाख जैसे बड़े आर्थिक विवाद का बिना सजा, बिना लंबे फैसले और बिना कटुता के समाप्त होना एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आया है।

यह मामला बताता है कि लोक अदालत केवल मामलों का निपटारा नहीं करती, बल्कि रिश्तों को बचाने, समय की बचत करने और समाज में सौहार्द बढ़ाने का भी प्रभावी माध्यम है।

पाकुड़ की विशेष लोक अदालत का यह सफल निपटारा उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो वर्षों से कानूनी विवादों में उलझे हैं। कई बार समाधान अदालत के अंतिम फैसले में नहीं, बल्कि बातचीत और आपसी विश्वास में छिपा होता है।

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