Sunday, September 13, 2026
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एडिटर इन चीफ
धर्मेन्द्र सिंह

दहेज की वेदी पर अब नहीं जलेगी बेटियों की जिंदगी: पाकुड़ में गांव-गांव गूंजी कानून की आवाज, जागा समाज

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पाकुड़। दहेज की आग में सिर्फ एक बेटी नहीं जलती, उसके साथ जलते हैं माता-पिता के सपने, परिवार की खुशियां और समाज की संवेदनाएं। कभी शादी के नाम पर दहेज की मांग, तो कभी मांग पूरी नहीं होने पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना—यह सामाजिक कुरीति आज भी कई परिवारों के लिए अभिशाप बनी हुई है। इसी अभिशाप के खिलाफ अब पाकुड़ के गांवों में कानून और जनजागरूकता की आवाज बुलंद होने लगी है।

“बेटी की जिंदगी की कीमत दहेज नहीं, उसका सम्मान है।” इसी संदेश के साथ पाकुड़ जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में दहेज प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ विशेष जागरूकता अभियान चलाया गया।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘स्टेट ऑफ यू.पी. बनाम अजमल बेग’ मामले में दिए गए फैसले/दिशानिर्देशों तथा इसके आलोक में झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशानुसार यह अभियान जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के तत्वावधान में आयोजित किया गया।

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ दिवाकर पांडेय के निर्देश पर तथा डालसा सचिव रूपा बंदना किरो के मार्गदर्शन में जिले के सभी प्रखंडों के ग्रामीण क्षेत्रों में पैरा लीगल वॉलंटियर्स ने घर-घर और गांव-गांव पहुंचकर लोगों को दहेज प्रथा के खिलाफ जागरूक किया।

गांवों में पहुंचा कानून, महिलाओं को बताया गया उनका अधिकार

शहरकोल, हीरानंदपुर, बाबूपुर, खाकसा, रोलाग्राम, कमलघाटी, खजूरडांगा, धर्मपुर, हिरणपुर, अमड़ापाड़ा, सोनाजोड़ी, चांडालमारा समेत जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में चलाए गए अभियान में लोगों को बताया गया कि दहेज मांगना या दहेज के लिए महिला को प्रताड़ित करना महज पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि कानून की नजर में गंभीर अपराध हो सकता है।

पैरा लीगल वॉलंटियर्स कमला राय गांगुली, नसीम अंसारी, याकूब अली, किंग्सुक नाग, मीरु बेसरा, सौरभ यादव, मनोज सोरेन, पिंटू मरांडी, चंद्रशेखर घोष, मरियम पिंकी किस्कू, सीमा साहा, कान्हु हांसदा, खुदू राजवंशी, मोलिता कुमारी, असुंता मुर्मू, जयंती कुमारी, लक्ष्मी कुमारी, आनंद मुर्मू, मणिलाल हेंब्रम, सुजाता घोष, जयंती टुडू, रानी साहा समेत अन्य ने ग्रामीणों को दहेज प्रथा के कानूनी और सामाजिक दुष्परिणामों की जानकारी दी।

अभियान के दौरान विशेष रूप से दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और दहेज मृत्यु से संबंधित कानूनी प्रावधानों को सरल भाषा में समझाया गया।

धारा 498ए IPC और धारा 85 BNS: क्रूरता के खिलाफ कानून की ढाल

ग्रामीणों को बताया गया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता करना अपराध है। वर्तमान में लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 में भी पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता के लिए दंड का प्रावधान है।

कानूनी जागरूकता के दौरान यह समझाया गया कि महिला के साथ होने वाली क्रूरता केवल मारपीट तक सीमित नहीं है। दहेज या संपत्ति की गैरकानूनी मांग को लेकर महिला को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना भी गंभीर कानूनी मामला हो सकता है।

ऐसे मामलों में पीड़ित महिला पुलिस से शिकायत कर सकती है और प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ कानूनी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। जागरूकता अभियान में बताया गया कि इस अपराध के लिए तीन वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।

अर्थात संदेश स्पष्ट था—दहेज की मांग को “घर का मामला” कहकर दबाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर कानून का सहारा लेना है।

धारा 304बी IPC और धारा 80 BNS: दहेज मृत्यु पर कठोर कानून

दहेज मृत्यु से जुड़े कानून की जानकारी देते हुए ग्रामीणों को IPC की धारा 304बी तथा BNS की धारा 80 के प्रावधानों के बारे में भी बताया गया।

समझाया गया कि यदि किसी महिला की शादी के सात वर्ष के भीतर जलने, शारीरिक चोट या अन्य असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु होती है और यह सामने आता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित या परेशान किया गया था, तो ऐसी मृत्यु दहेज मृत्यु के दायरे में आ सकती है।

कानून दहेज मृत्यु को बेहद गंभीर अपराध मानता है। इसके लिए कम से कम सात वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

ग्रामीणों को यह भी संदेश दिया गया कि दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना को शुरुआती स्तर पर ही गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि समय रहते शिकायत और कानूनी सहायता लेने से पीड़िता को सुरक्षा और न्याय की दिशा में मदद मिल सकती है।

“सहन करना मजबूरी नहीं”—पीड़ित महिलाओं को बताया गया मदद का रास्ता

जागरूकता अभियान में महिलाओं को यह संदेश भी दिया गया कि यदि वे दहेज की धमकी, घरेलू हिंसा या किसी प्रकार के उत्पीड़न का सामना कर रही हैं, तो उन्हें चुप रहकर सब कुछ सहने की जरूरत नहीं है।

आपात स्थिति में 112/100 पर संपर्क किया जा सकता है। महिलाओं के लिए 181 महिला हेल्पलाइन, महिला थाना और अन्य संस्थागत सहायता के विकल्पों की जानकारी भी दी गई।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह बताई गई कि आर्थिक कठिनाई कानूनी न्याय के रास्ते में बाधा नहीं बनेगी। जरूरतमंद पीड़ित महिलाएं जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ से निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती हैं। यानी जिनके पास वकील करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं, उनके लिए विधिक सेवा प्राधिकरण न्याय तक पहुंचने में सहायता का माध्यम बन सकता है।

दहेज के खिलाफ कानून से आगे सामाजिक चेतना की जरूरत

अभियान का उद्देश्य केवल कानून की धाराएं गिनाना नहीं था, बल्कि समाज को यह समझाना भी था कि दहेज जैसी कुरीति कानून के डर से ही नहीं, सामूहिक सामाजिक संकल्प से समाप्त होगी।

ग्रामीणों के बीच यह संदेश दिया गया कि बेटी की शादी को आर्थिक लेन-देन का माध्यम बनाने के बजाय उसके सम्मान, शिक्षा और भविष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दहेज देने और लेने की मानसिकता को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बनाने के बजाय उसका खुलकर विरोध करना होगा।

क्योंकि दहेज की मांग जब पहली बार उठती है, तभी उसका विरोध जरूरी है। जब मांग उत्पीड़न में बदल जाए, तब कानून का सहारा जरूरी है। और जब उत्पीड़न जानलेवा हो जाए, तब हर संवेदनशील व्यक्ति का हस्तक्षेप जरूरी है।

गांवों में लिया गया संकल्प—दहेज को ना, बेटियों को सम्मान

अभियान के अंत में लोगों ने एकजुट होकर दहेज प्रथा के खिलाफ खुलकर विरोध करने और इस सामाजिक कुरीति को समाप्त करने का संकल्प लिया।

यह संकल्प उस बदलाव की उम्मीद है, जिसमें किसी पिता को बेटी की शादी के लिए अपनी जमीन बेचने या कर्ज में डूबने की चिंता न हो; किसी बेटी को दहेज कम लाने के लिए ताने न सुनने पड़ें और किसी महिला को पति या ससुराल वालों की प्रताड़ना को अपनी नियति मानकर चुप न रहना पड़े।

दहेज की वेदी पर अब किसी बेटी की जिंदगी न जले—इसी संकल्प के साथ पाकुड़ के गांवों में कानून की आवाज पहुंची है।

यह आवाज सिर्फ कानूनी धाराओं की आवाज नहीं है। यह उन बेटियों की आवाज है जो सम्मान के साथ जीना चाहती हैं। यह उन माताओं की आवाज है जो अपनी बेटियों को विदा करते समय डर नहीं, भरोसा देना चाहती हैं। और यह उस समाज की आवाज है जो अब यह कहने को तैयार है—

“दहेज नहीं, बेटी का सम्मान चाहिए; खामोशी नहीं, न्याय चाहिए।”

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