पाकुड़। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 139वें एपिसोड को लेकर पाकुड़ में भाजपा कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच उत्साह का माहौल रहा। पाकुड़ नगर मंडल के मतदान केंद्र संख्या 427 पर बूथ अध्यक्ष लव रजक के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं एवं स्थानीय लोगों ने प्रधानमंत्री के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना। कार्यक्रम में भाजपा जिला उपाध्यक्ष हिसाबी राय सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त मंडल अध्यक्ष सोहन मंडल, सुशील साहा, मनोरमा देवी, वरुण राय, किरण राय, खिचर राय और रूपांकर राय ने भी अपने-अपने बूथों पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुना।
स्थानीय उत्पादों को अपनाने का आह्वान, आत्मनिर्भर भारत की मजबूत होती तस्वीर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में त्योहारों के अवसर पर स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों द्वारा निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि त्योहार केवल खुशियां बांटने का अवसर नहीं होते, बल्कि देश के मेहनतकश लोगों के जीवन में आशा और समृद्धि का उजाला भरने का भी माध्यम बन सकते हैं। परिवार और प्रियजनों के लिए खरीदारी करते समय यदि लोग स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें, तो इससे कारीगरों का उत्साह बढ़ेगा और उनकी आजीविका को मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट था कि स्थानीय उत्पादों को अपनाना केवल खरीदारी का विकल्प नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
विदेशों तक पहुंच रही भारतीय उपज, किसानों के लिए खुल रहे नए द्वार
प्रधानमंत्री ने भारतीय कृषि उत्पादों की बढ़ती वैश्विक पहचान का उल्लेख करते हुए बताया कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादित वस्तुएं अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच रही हैं। बिहार के पूर्णिया का मखाना और कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर दाल जैसे उत्पादों की विदेशों तक पहुंच भारतीय किसानों की मेहनत और स्थानीय उपज की संभावनाओं को रेखांकित करती है। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग किसानों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रही है। खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों की मेहनत जब सीमाओं को पार कर दुनिया के बाजारों तक पहुंचती है, तो वह केवल व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत का भी प्रतीक बन जाती है।
12 वर्षों की यात्रा, जन-जन से जुड़ने का माध्यम बना ‘मन की बात’
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ‘मन की बात’ की यात्रा का स्मरण करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम की शुरुआत 12 वर्ष पूर्व विजयादशमी के पावन अवसर पर हुई थी। उनके लिए यह यात्रा देशवासियों को करीब से जानने, उनकी भावनाओं को समझने और उनके अनुभवों से जुड़ने का एक तीर्थयात्रा के समान अनुभव रही है। समय के साथ यह कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में घटित होने वाली प्रेरणादायक घटनाओं, सामाजिक पहलों और आम नागरिकों के असाधारण प्रयासों को सामने लाने का माध्यम बना है।
स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद की 150वीं जयंती का स्मरण
प्रधानमंत्री ने महान स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद की 150वीं जयंती का उल्लेख करते हुए उनके संघर्षपूर्ण जीवन और राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद किया। आर्य समाज और गदर पार्टी से जुड़े भाई परमानंद ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना किया और अंग्रेजी शासन के दौरान कालापानी की सजा भी भुगती। प्रधानमंत्री ने उनके जीवन से जुड़े उन प्रसंगों को भी सामने रखा, जो देश की आजादी के लिए समर्पित क्रांतिकारियों के साहस, त्याग और वैचारिक प्रतिबद्धता की याद दिलाते हैं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण नई पीढ़ी को देश के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
अंगदान की मिसाल बनीं शिवानी, परिवार के निर्णय ने दिया मानवता का संदेश
प्रधानमंत्री ने अंगदान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम की शिवानी का उदाहरण साझा किया। शिवानी सड़क दुर्घटना की शिकार हो गई थीं, लेकिन इस कठिन परिस्थिति में उनके परिवार ने अंगदान का निर्णय लिया। यह निर्णय केवल एक परिवार की संवेदनशीलता का परिचय नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों के लिए आशा का संदेश है, जिनका जीवन अंग प्रत्यारोपण से बचाया जा सकता है। प्रधानमंत्री के संबोधन में इस प्रसंग ने मानवीय संवेदना, परोपकार और दूसरों के जीवन में नई रोशनी भरने की भावना को प्रमुखता से सामने रखा।
खादी की बिक्री 28 करोड़ रुपये के पार, स्वदेशी के प्रति बढ़ता विश्वास
प्रधानमंत्री ने खादी और ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री में दर्ज वृद्धि का उल्लेख करते हुए बताया कि गांधी जयंती के अवसर पर एक ही दिन में इन उत्पादों की बिक्री 28 करोड़ रुपये से अधिक रही। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये अधिक बताया गया। खादी, जो कभी स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी चेतना का प्रतीक बनी थी, आज स्थानीय रोजगार, पारंपरिक कौशल और आत्मनिर्भरता की भावना से भी जुड़ी है। बिक्री में हुई यह वृद्धि देश के कारीगरों और छोटे उद्यमियों के लिए उत्साहजनक संकेत के रूप में सामने आई।
पारंपरिक खेती को नया जीवन, प्राकृतिक कृषि की ओर बढ़ते कदम
प्रधानमंत्री ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जैविक खेती को पुनर्जीवित करने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए ‘खेती विरासत मिशन’ नामक संस्था की पहल के बारे में बताया। संस्था की टीम पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना चाहती थी। इस पहल को ‘नव त्रिजंन’ नाम दिया गया। इसका उद्देश्य खेती की पारंपरिक समझ और प्राकृतिक तरीकों को नए सिरे से प्रोत्साहित करना है। कृषि के बदलते स्वरूप के बीच ऐसी पहलें इस बात की याद दिलाती हैं कि आधुनिक विकास के साथ-साथ परंपरागत ज्ञान और प्रकृति के अनुकूल खेती के तरीकों का संरक्षण भी आवश्यक है।
आयुष्मान आरोग्य मंदिरों से स्वास्थ्य सेवाओं को मिल रहा नया आधार
स्वास्थ्य सेवाओं में आए बदलावों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले डॉक्टर से परामर्श लेने और जांच कराने में लोगों को काफी समय लग जाता था। आज देशभर में लगभग एक लाख नब्बे हजार आयुष्मान आरोग्य मंदिर लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से स्वास्थ्य सुविधाओं को आम लोगों के करीब लाने का प्रयास किया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में सुधार का उद्देश्य यही है कि लोगों को समय पर जरूरी परामर्श और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकें।
स्थानीय से वैश्विक तक, ‘मन की बात’ में उभरा आत्मनिर्भर भारत का संदेश
प्रधानमंत्री के 139वें ‘मन की बात’ कार्यक्रम में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने, किसानों की उपज को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने, खादी की लोकप्रियता, पारंपरिक खेती, अंगदान और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे विषयों पर जोर दिया गया। पाकुड़ में भाजपा कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने भी इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री के विचारों को सुना। पूरे संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि देश की प्रगति केवल बड़े उद्योगों और महानगरों से नहीं, बल्कि गांवों, किसानों, कारीगरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के छोटे-छोटे प्रयासों से भी आकार लेती है। स्थानीय प्रतिभा और उत्पादों को सम्मान देकर ही आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को और अधिक मजबूती दी जा सकती है।


