पाकुड़। न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं, बल्कि विवाद के बीच ऐसा रास्ता तलाशना भी है, जहां दोनों पक्ष अपनी बात रख सकें और समाधान की एक नई राह खुल सके। इसी भावना को साकार करते हुए शनिवार को पाकुड़ व्यवहार न्यायालय परिसर में मासिक लोक अदालत का आयोजन किया गया। यहां मुकदमों की लंबी प्रक्रिया के बीच समझौते को समाधान का माध्यम बनाया गया और कुल 66 मामलों का निष्पादन कराया गया।
समझौते की राह से निकला समाधान
झालसा, रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ के तत्वावधान में आयोजित लोक अदालत की अध्यक्षता प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ दिवाकर पांडेय ने की। वहीं कार्यक्रम का संचालन प्रभारी सचिव विशाल मांझी की देखरेख में हुआ।
लोक अदालत की विशेषता यही रही कि समझौते योग्य मामलों को आपसी सहमति और संवाद के माध्यम से समाप्त करने की पहल की गई। जहां सामान्य न्यायिक प्रक्रिया में किसी विवाद को अपने अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में समय लग सकता है, वहीं लोक अदालत पक्षकारों को सहमति के आधार पर विवाद समाप्त करने का अवसर प्रदान करती है।
नौ बेंचों ने संभाली न्यायिक प्रक्रिया
मासिक लोक अदालत के सफल संचालन के लिए कुल नौ बेंचों का गठन किया गया। इन बेंचों के माध्यम से विभिन्न समझौता योग्य मामलों की सुनवाई और निष्पादन की प्रक्रिया पूरी की गई।
पूरे दिन न्यायालय परिसर में कानून की औपचारिकता के साथ-साथ समझौते और समाधान की मानवीय भावना भी दिखाई दी। पक्षकारों के लिए लोक अदालत केवल एक न्यायिक मंच नहीं, बल्कि अपने विवाद को लंबा खींचने के बजाय सहमति के रास्ते से समाप्त करने का अवसर भी बनी।
66 मामलों का हुआ निष्पादन
लोक अदालत के दौरान कुल 66 वादों का निष्पादन कराया गया। इन मामलों में समझौते के माध्यम से कुल 2,00,727 रुपये की राशि का समझौता कराया गया।
इन आंकड़ों के पीछे केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उन पक्षकारों की कहानी भी है जो किसी न किसी विवाद के कारण न्यायालय की चौखट तक पहुंचे थे। लोक अदालत की प्रक्रिया ने उन्हें यह अवसर दिया कि विवाद को केवल कानूनी संघर्ष के रूप में देखने के बजाय आपसी सहमति से समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
न्याय की एक ऐसी राह, जहां जीत से अधिक समाधान महत्वपूर्ण
लोक अदालत की मूल भावना ही ऐसी है, जिसमें विवाद के दोनों पक्षों को संवाद और समझौते के माध्यम से समाधान तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। यहां न्याय की तस्वीर केवल किसी एक पक्ष की जीत और दूसरे की हार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विवाद के शांतिपूर्ण अंत को भी महत्व दिया जाता है।
कई बार मुकदमे की राह जितनी लंबी होती जाती है, उतना ही समय, श्रम और संसाधन दोनों पक्षों को खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में समझौता योग्य मामलों के लिए लोक अदालत एक ऐसा वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराती है, जहां सहमति के आधार पर विवाद को समाप्त करने की संभावना बनती है।
न्यायिक अधिकारियों और अधिवक्ताओं की रही मौजूदगी
मौके पर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार दिवाकर पांडेय, प्रधान न्यायाधीश कुटुंब न्यायालय रजनीकांत पाठक, अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम कुमार क्रांति प्रसाद, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी संजीत कुमार चंद्र, प्रभारी सचिव सह अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विशाल मांझी, अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी सदिश उज्जवल बेक, प्रभारी न्यायाधीश विजय कुमार दास समेत न्यायालय के कर्मी, अधिवक्ता, पारा लीगल वॉलंटियर्स तथा वादी-प्रतिवादी मौजूद रहे।
मुकदमे से समझौते तक न्याय का मानवीय पक्ष
लोक अदालत का यह आयोजन इस बात का संदेश देता है कि न्याय व्यवस्था में कानून और मानवीय संवेदना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। जहां कानून अधिकारों की रक्षा करता है, वहीं समझौते की प्रक्रिया विवादों के बीच संवाद का पुल बनाने का अवसर देती है।
पाकुड़ में आयोजित मासिक लोक अदालत में 66 मामलों का निष्पादन इसी प्रयास की एक तस्वीर रहा जहां मुकदमों की लंबी राह के बीच कुछ कदम समझौते की ओर बढ़े और विवादों के समाधान का रास्ता खुला।


