पाकुड़। डिजिटल दुनिया ने बच्चों के लिए ज्ञान और संवाद के नए दरवाजे खोले हैं, लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसे खतरे भी छिपे हैं, जिनकी पहचान करना हर बच्चे के लिए आसान नहीं होता। अनजान व्यक्ति से ऑनलाइन दोस्ती, निजी तस्वीरें साझा करने का दबाव और इंटरनेट के जरिए होने वाला शोषण—ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर बच्चों को जागरूक करना आज परिवार, विद्यालय और समाज की साझा जिम्मेदारी बन गया है।
इसी सामाजिक सरोकार को केंद्र में रखते हुए झालसा, रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा), पाकुड़ की ओर से पाकुड़िया प्रखंड के संत लुकास उच्च विद्यालय, बेलपहाड़ी में ‘सुरक्षित बचपन अभियान’ के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण, उनके कानूनी अधिकारों, व्यक्तिगत सुरक्षा और साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक करना था।
प्रभारी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह जिला विधिक सेवा प्राधिकार के अध्यक्ष कुमार क्रांति प्रसाद के निर्देश पर आयोजित इस कार्यक्रम में डालसा सचिव रूपा बंदना किरो की उपस्थिति रही। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को बताया कि सुरक्षित बचपन केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक दायित्व है, जिसमें बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी बात सुनना, उन पर भरोसा करना और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करना भी शामिल है।
ऑनलाइन दोस्ती की चमक के पीछे छिपे खतरे को पहचानना जरूरी
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया बच्चों की दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं। ऑनलाइन बातचीत, गेमिंग और सोशल नेटवर्किंग के बीच कई बार बच्चों का संपर्क ऐसे लोगों से हो सकता है, जिनकी वास्तविक पहचान और मंशा के बारे में उन्हें जानकारी नहीं होती।
कार्यक्रम में लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के सहायक गंगाराम टुडू और स्थायी लोक अदालत के सदस्य राजीव कुमार झा ने विद्यार्थियों को इस संबंध में सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अनजान लोगों से ऑनलाइन दोस्ती करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। किसी के कहने पर अपनी निजी जानकारी, तस्वीरें या वीडियो साझा नहीं करने चाहिए।
वक्ताओं ने यह भी समझाया कि यदि कोई व्यक्ति निजी तस्वीरों या वीडियो की मांग करता है, अनुचित बातचीत करता है अथवा किसी तरह का दबाव बनाता है, तो बच्चे चुप रहने के बजाय अपने माता-पिता, शिक्षक या किसी भरोसेमंद वयस्क को इसकी जानकारी दें।
यह संदेश केवल बच्चों के लिए नहीं, अभिभावकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि परिवार में ऐसा माहौल हो, जहां बच्चे बिना डर और झिझक के अपनी परेशानी साझा कर सकें। डर, डांट या शर्मिंदगी की आशंका बच्चों को चुप करा सकती है, जबकि समय पर संवाद उन्हें खतरे से बाहर निकालने में मदद कर सकता है।
POCSO कानून: बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों की जानकारी
कार्यक्रम में बच्चों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो (POCSO) एक्ट के महत्वपूर्ण प्रावधानों की जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि यह कानून बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण प्रदान करने के लिए बनाया गया है और ऐसे मामलों में बच्चों की सुरक्षा तथा उनके साथ संवेदनशील व्यवहार का विशेष महत्व है।
विद्यार्थियों को लैंगिक समानता, व्यक्तिगत सुरक्षा और बाल संरक्षण से जुड़े कानूनी अधिकारों के बारे में भी बताया गया। कार्यक्रम के दौरान बच्चों के साथ संवाद कर उनकी जिज्ञासाओं और सुरक्षा से संबंधित सवालों पर चर्चा की गई।
कानून की जानकारी का महत्व तभी पूरा होता है, जब बच्चे यह समझ सकें कि अनुचित व्यवहार होने पर उन्हें मदद मांगने का अधिकार है। किसी गलत व्यवहार के लिए बच्चे को दोषी ठहराना या उसे चुप रहने के लिए कहना समस्या को और गंभीर बना सकता है। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, विश्वास और समय पर सहायता की भूमिका अहम होती है।
‘बोलो, बताओ, बचाओ’: चुप्पी नहीं, संवाद है सुरक्षा की शुरुआत
कार्यक्रम में ‘मेरा बचपन, मेरा अधिकार’, ‘कानून जानो, बचपन बचाओ’, ‘सुरक्षित क्लिक, सुरक्षित बचपन’, ‘बोलो, बताओ, बचाओ’ और ‘न बाल विवाह, न बाल शोषण’ जैसे विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को जागरूक किया गया।
इन संदेशों का मूल उद्देश्य बच्चों को यह भरोसा दिलाना है कि उनकी सुरक्षा, सम्मान और अधिकार महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई व्यक्ति उन्हें असहज महसूस कराता है, डराता है, धमकाता है या किसी अनुचित गतिविधि में शामिल करने की कोशिश करता है, तो वे मदद मांग सकते हैं।
बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल उन्हें सावधान रहने की सलाह देने तक सीमित नहीं है। विद्यालयों को सुरक्षित वातावरण देना, अभिभावकों को बच्चों की बात गंभीरता से सुनना और समाज को बाल शोषण के मामलों में संवेदनशील रहना भी उतना ही जरूरी है।
चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 की दी गई जानकारी
कार्यक्रम में बच्चों को बाल संरक्षण और आपातकालीन सहायता के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 की जानकारी दी गई। बच्चों को बताया गया कि संकट या असुरक्षित स्थिति में मदद मांगना जरूरी है और उन्हें सहायता के उपलब्ध माध्यमों की जानकारी होनी चाहिए।
इसके साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पाकुड़ की ओर से उपलब्ध निःशुल्क कानूनी सहायता के बारे में भी जानकारी दी गई। इसका उद्देश्य बच्चों और जरूरतमंद लोगों को उनके कानूनी अधिकारों तथा सहायता प्राप्त करने के रास्तों से परिचित कराना था।
कानूनी सहायता और बाल संरक्षण से जुड़ी जानकारी विशेष रूप से उन परिवारों के लिए उपयोगी है, जिन्हें यह नहीं पता होता कि किसी समस्या की स्थिति में कहां संपर्क करें और किससे मार्गदर्शन लें।
बच्चों की सुरक्षा में परिवार, स्कूल और समाज की साझा भूमिका
बाल सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब उनका संदेश कार्यक्रम स्थल से निकलकर घरों और समुदायों तक पहुंचे। बच्चे अक्सर अपने आसपास के वयस्कों के व्यवहार से सीखते हैं। इसलिए उन्हें सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल करने की सलाह देने के साथ-साथ बड़ों का जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार भी जरूरी है।
अभिभावक बच्चों से मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर संवाद करें, शिक्षक उनकी शिकायतों को गंभीरता से लें और समुदाय बाल शोषण या बाल विवाह जैसी समस्याओं को नजरअंदाज न करे। बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें डराने के बजाय उन्हें सही जानकारी देना और भरोसे का माहौल बनाना अधिक प्रभावी रास्ता है।
सुरक्षित बचपन का अर्थ केवल अपराध से बचाव नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना भी है, जहां हर बच्चा सम्मान के साथ जी सके, अपनी बात कह सके और जरूरत पड़ने पर सहायता प्राप्त कर सके।
कार्यक्रम में विद्यालय के फादर फैलिक्स केरकेट्टा, शिक्षक-शिक्षिकाएं, डालसा के नंदलाल पाल, पैरा लीगल वॉलंटियर नीरज कुमार राउत सहित छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
संदेश साफ है: बच्चों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल कानून या प्रशासन की नहीं, पूरे समाज की है। बच्चों को जागरूक करना पहला कदम है, उनकी बात सुनना दूसरा और संकट के समय उनके साथ खड़े होना हमारी वास्तविक सामाजिक जिम्मेदारी है।


