Thursday, September 17, 2026
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एडिटर इन चीफ
धर्मेन्द्र सिंह

भक्ति जहां आत्मा को छू गई, वहीं कला ने मन को मोह लिया… गणपति की महाआरती से नन्हे कलाकारों की थिरकन तक यादगार बनी पाकुड़ की रात

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पाकुड़। कभी-कभी कोई उत्सव केवल उत्सव नहीं रहता, वह मनुष्य के भीतर छिपी आस्था, संवेदना और संस्कृति को एक साथ स्पर्श कर जाता है। रेलवे मैदान पाकुड़ में सार्वजनिक गणेश पूजा समिति की ओर से आयोजित 28वें गणपति महोत्सव का दूसरा दिन भी कुछ ऐसा ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव लेकर आया। बुधवार की शाम जैसे-जैसे ढलती गई, रेलवे मैदान में श्रद्धा का दीप और सांस्कृतिक रंग साथ-साथ प्रज्वलित होते गए।

सुबह से ही गणपति के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। शाम को विधिवत पूजा के बाद जब बाबा गणपति जी की भव्य महाआरती शुरू हुई, तो कुछ क्षणों के लिए पूरा वातावरण जैसे अपनी गति भूलकर भक्ति में ठहर गया। घंटियों, गाजे-बाजे और गणपति के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं की आंखों में आस्था और चेहरे पर आत्मिक प्रसन्नता दिखाई दी।

महाआरती में झुके सिर, भीतर जगा विश्वास

पुरोहित सजल चटर्जी एवं शुभो सहाना ने विधिवत पूजा-अर्चना और महाआरती संपन्न कराई। आरती की लौ जैसे केवल प्रतिमा के सम्मुख ही नहीं जल रही थी, बल्कि श्रद्धालुओं के भीतर भी विश्वास का एक दीप जला रही थी।

गणपति की आरती के दौरान पूरा रेलवे मैदान भक्तिमय हो उठा। कहीं हाथ प्रार्थना में जुड़े थे, कहीं जयकारों में उत्साह उमड़ रहा था और कहीं मौन आंखों में अपनी-अपनी मनोकामनाओं का संसार सिमटा हुआ था।

महाआरती के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। प्रसाद ने पूजा की आध्यात्मिक अनुभूति को सामूहिक प्रसन्नता में बदल दिया।

दीप जला तो भक्ति से संस्कृति तक खुला उत्सव का दूसरा अध्याय

महाआरती की आध्यात्मिक गरिमा के बाद सांस्कृतिक संध्या ने उत्सव को एक नया आयाम दिया। अनुमंडल पदाधिकारी साइमन मरांडी, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी कुमार गौरव, सहायक उपाध्यक्ष डीबीएल ब्रजेश कुमार, वार्ड पार्षद निभा देवी, ईआरएमयू अध्यक्ष अखिलेश कुमार चौबे, सचिव संजय कुमार ओझा, सहायक स्टेशन प्रबंधक कुमार विकास एवं राणा शुक्ला ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर एवं फीता काटकर सांस्कृतिक कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

दीप प्रज्ज्वलन का वह क्षण अपने आप में प्रतीकात्मक था—एक ओर गणपति की आराधना से भीतर का अंधकार मिटाने की परंपरा और दूसरी ओर कला के माध्यम से समाज के भीतर छिपी प्रतिभाओं को प्रकाश देने का प्रयास।

मंचासीन अतिथियों का स्वागत अविनाश पंडित, अजीत कुमार, तन्मय पोद्दार, पिंटू हाजरा, राज चौधरी, अंकित शर्मा, बुवाई रजक एवं अंकित मंडल ने पुष्पगुच्छ और स्मृति चिह्न भेंट कर किया।

मंच पर थिरके कदम, तो खिल उठे नन्हे सपने

सांस्कृतिक संध्या का मुख्य आकर्षण नृत्य प्रतियोगिता रही। कोलकाता, मालदा, रामपुरहाट, जंगीपुर, भागलपुर और साहिबगंज सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से मंच को जीवंत कर दिया।

कोलकाता से पहुंचे नृत्य निर्णायक उज्ज्वल हालदार एवं शंकर लाल साहा ने प्रतियोगिता की जिम्मेदारी संभाली, जबकि उद्घोषक कैलाश मध्यान्ह ने अपनी प्रस्तुति और संचालन से कार्यक्रम में ऊर्जा बनाए रखी।

एक के बाद एक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बांधे रखा। लेकिन सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रहे नन्हे बाल कलाकार। छोटे-छोटे कदम जब संगीत की लय पर थिरके तो मंच पर केवल नृत्य नहीं था—वह आत्मविश्वास, सपनों और आने वाली पीढ़ी की सांस्कृतिक चेतना की झलक भी थी।

उनकी प्रस्तुतियों पर देर तक तालियां गूंजती रहीं। मासूम चेहरों पर मंच का आत्मविश्वास और प्रस्तुतियों में दिखाई देती सहजता ने दर्शकों को भावुक भी किया और उत्साहित भी।

जब परंपरा और आधुनिक मंच एक साथ आए

गणपति महोत्सव की खूबसूरती यही रही कि यहां परंपरा और आधुनिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति एक-दूसरे के सामने नहीं, बल्कि साथ दिखाई दीं। एक ओर वैदिक विधि से पूजा, महाआरती और प्रसाद की परंपरा थी, तो दूसरी ओर आधुनिक मंच पर नृत्य और प्रतिभा का प्रदर्शन।

यही संगम किसी भी जीवंत संस्कृति की पहचान होता है। परंपरा जब समय के साथ संवाद करती है, तो वह केवल अतीत की स्मृति नहीं रहती, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भविष्य की भाषा बन जाती है।

भीड़ बढ़ी तो सुरक्षा व्यवस्था भी रही मुस्तैद

कार्यक्रम के दौरान रेलवे मैदान दर्शकों और श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी को देखते हुए पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए थे।

निरीक्षक-सह-प्रभारी अनिल गुप्ता के नेतृत्व में पुलिस बल ने सुरक्षा व्यवस्था संभाली, जबकि प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी रवि राकेश ने कार्यक्रम स्थल पर लगातार निगरानी बनाए रखी।

सामूहिक प्रयास से साकार हुआ उत्सव

कार्यक्रम का संचालन अनिकेत गोस्वामी ने किया। आयोजन को सफल बनाने में पूजा के संस्थापक हिसाबी राय, संजय कुमार राय, रणजीत राम, निर्भय कुमार सिंह, नितिन मंडल, रवि पटवा, अग्नि अंश राज, अभिषेक कुमार, कृष्ण घोष, रतुल दे एवं साकेकुल आलम सहित समिति के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई।

एक रात, जिसमें पूजा भी थी और जीवन का उत्सव भी

गणपति महोत्सव की यह रात केवल एक धार्मिक आयोजन की रात नहीं रही। यह उस भारतीय सांस्कृतिक दर्शन की झलक भी बनी, जहां भक्ति मन को विनम्र बनाती है और कला उसे अभिव्यक्ति देती है।

महाआरती में जहां श्रद्धालुओं ने अपने मन को गणपति के चरणों में अर्पित किया, वहीं नन्हे कलाकारों ने अपने सपनों को मंच पर अभिव्यक्ति दी। एक ओर हाथ प्रार्थना में जुड़े थे, दूसरी ओर वही संस्कृति नृत्य के माध्यम से जीवन की लय बनकर सामने आ रही थी।

इसीलिए रेलवे मैदान की वह रात देर तक केवल रोशनी से नहीं, बल्कि आस्था, कला, संस्कार और सामूहिक उल्लास से जगमगाती रही। गणपति के जयकारों से शुरू हुई शाम जब नन्हे कलाकारों की थिरकन और तालियों की गूंज में ढली, तो पाकुड़ ने एक बार फिर महसूस किया कि उत्सव तभी पूर्ण होता है, जब उसमें ईश्वर के प्रति श्रद्धा और जीवन के प्रति उत्साह—दोनों साथ धड़कें।

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